गंगोलीहाट में पहुँचा प्रतिरोध का सिनेमा, यह मुख्य धारा की फिल्मों से अलग है

गंगोलीहाट में पहुँचा प्रतिरोध का सिनेमा, यह मुख्य धारा की फिल्मों से अलग है





उत्तराखंड (पल पल न्यूज) : उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट कस्बे में स्थित कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय में दो दिवसीय फ़िल्म कार्य शाला के पहले दिन की शुरुआत उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी के साथी धर्मराज जोशी ने प्रतिरोध के सिनेमा का परिचय देते हुए उन्होने कहा कि ‘प्रतिरोध का सिनेमा है तो उसमे प्रतिरोध भी है और सिनेमा भी है। प्रतिरोध इसलिए कि यह मुख्यधारा की फिल्मों से अलग है जिसमें शब्द और चमक-दमक के साथ फूहड़ म्यूजिक प्रधान नहीं है। सेलिब्रिटी कल्चर नहीं है और यह आमतौर पर दर्शकों को देखने को नहीं मिलता और सिनेमा है तो इसमें बच्चे बड़ों और नौजवानो के अलावा महिलाओं पर बनी फ़िल्में भी है।

‘ इसी क्रम में चेरी टेल, नेबर्स और केबिन मैन जैसी फ़िल्में दिखाई गयी। जिसका मकसद बच्चों को दुनिया की सैर कराना और सिनेमा की भाषा पर बात करना था। ये फ़िल्में बिना शब्दों के सिर्फ ऑडियो और विसुअल से अपनी बात रखती है। इस स्कूल के बच्चों की एक खासियत है कि सभी संगीत प्रेमी है जिसमें कोई अच्छा गाता है तो कोई अच्छा बजाता है। उनकी इस रूचि को देखते हुए साथी संजय जोशी ने फ़िल्म क्यूरेशन में तुरंत बदलाव लाते हुए उस्ताद अब्दुल रशीद खान पर बनी फ़िल्म रसन पिया दिखाई । इसी बहाने फ़िल्मकार हमको कलकत्ता और रायबरेली की सैर करवाती हैं जहाँ संगीत बज रहा होता है। 103 साल की उम्र में भी रशीद खान ने गाना और संगीत सिखाना नहीं छोड़ा जो कि उनके संगीत प्रेम को दर्शाता है। इस पर संजय जोशी और जानकारी देते हुए कहते हैं कि ‘रशीद खान का 80 साल का सीखने-सिखाने का सफ़र है।

ITC की संगीत रिसर्च अकादमी में उस्ताद रशीद खान रहे और वही संगीत की शिक्षा भी देते रहे।’ उसके बाद मदुरै नगर परिषद में काम करने वाली दलित महिला पर बनी फ़िल्म PEE भी देखी, जो सरकार के स्वच्छता अभियान और सरकारी सफाई कर्मियों के लिए किये जाने वाले स्वास्थ्य सुरक्षा इंतजामों की भी पोल खोलती है। जिसको बच्चों ने काफी पसंद किया। लंच के बाद बच्चों को कीड़े मकोड़ों की दुनिया में ले जाया गया। उसके बाद बच्चों को Open a door के माध्यम से अर्जेंटीना और USA ले जाया गया। दिन के आखिर में प्यार और दोस्ती की बाते करती फ़िल्में रेड बलून और अब्बास कैरोस्तामी की two solution for one problem दिखाई गयी। फिल्म रेड बलून का सेशन साथी धर्मराज जोशी ने लिया। बच्चों से बातचीत में उन्होंने बताया कि यह दोस्ती और प्यार की फ़िल्म है जिसमें बच्चे और गुब्बारे का एक दूसरे से लगाव दिखाया गया है।



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इसी बहाने बच्चे पेरिस की सैर भी कर आये। आज के दिन की खासियत यह भी रही थी कि फ़िल्म देखने के साथ बीच-बीच में बच्चे ब्रेक टाइम में गीत प्रस्तुत कर रहे थे। दूसरी रोचक बात यह की खाने के बाद सभी बच्चे सुस्ताते हुए जमीन पर लेट कर फ़िल्म देख रहे थे जो आज के सेशन को किसी भी अन्य औपचारिक कार्यशाला के सेशन से अलग रखता है जहाँ बच्चों को सावधान की मुद्रा में ही सेशन अटेंड करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। फ़िल्म स्क्रीनिंग के बाद बच्चों से सिनेमा के बारे में बात की गयी। जिसमें बबली अपना दिनभर का अनुभव साझा करती है कि उसने इस तरह फ़िल्में पहले बिलकुल नहीं देखी। ये फ़िल्में TV पर आने वाली फिल्मों से अलग है। 12वीं की छात्रा सपना फ़िल्म और उसके इफ़ेक्ट कैसे डाले जाते है इस पर सवाल करती है। इस पर साथी संजय जोशी बड़ी धैर्य के साथ इन सवालों का जवाब देते है। इसी पर आगे कहते है कि ‘सिनेमा बनाना और सिनेमा दिखाना दोनों इम्पोर्टेन्ट होते है, सिनेमा की अपनी भाषा होती है जिसके दो मुख्य अवयव होते है- साउंड और विसुअल।

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‘ सिनेमा का मकसद सिर्फ नाच गाना नहीं होता उसका समग्र अर्थ है जिसमें मदुरै की दलित महिला, कीड़े मकोड़े, बच्चे सब शामिल है। सिनेमा का काम शायद हमारे दिमाग की खिड़कियों को खोलना और उसमें राडार लगा कर सभी चीजों को पकड़ना भी है। ज्ञात हो कि स्कूल की सभी लड़किया ग्रामीण परिवेश से है साथी ही यहाँ वो ही लड़कियां है जिनकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं है जो आगे पढने, प्रतिरोध के सिनेमा जैसे अलग अनुभव प्राप्त करने के लिए स्कॉलरशिप की दरकरार रखती है।

इसके अलावा संगीत इनके ज़हन में इस कदर समाया है जिसको बस थोड़ा पॉलिश करने की जरुरत है। इन सभी लड़कियों के लिए यह एक नया अनुभव है। सेशन के अंत में सपना बताती है की वो बड़ी होकर IPS बनना है। आरती RTO बनना चाहती है। चर्चा में शिक्षक भी भाग लेते हुए कहते है कि “केबिन मैन फ़िल्म उनको अच्छी लगी। इसमें बूढ़े केबिन मैन के जीवन की उदासीनता और काम के लगाव को चित्रों और साउंड के माध्यम से दिखाया गया है। कार्यक्रम के आखिर में सभी बच्चों ने फ़िल्मी, पहाड़ी और पंजाबी गानों को बड़े सुर ताल के साथ गा कर विदा लिया।

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satyabha

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