दंगल: आप फ़िल्म को देखना की सोच रहें तो सोचिए मत और ज़रूर देखने जाइए क्योंकि ये दूसरी फ़िल्मों से अलग है।

दंगल: आप फ़िल्म को देखना की सोच रहें तो सोचिए मत और ज़रूर देखने जाइए क्योंकि ये दूसरी फ़िल्मों से अलग है।

हरियाणा के भिवानी ज़िले का एक छोटा सा गांव बलाली जहां से शुरू होती है महावीर सिंह फ़ोगाट (आमिर ख़ान) की उम्मीदों की कहानी। बलाली के पहलवान महावीर फ़ोगाट भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने का अपना ख़्वाब पूरा न कर सके थे। अब उसी सपने को पूरा करने के लिए फ़ोगाट अपनी पत्नी दया शोभा कौर (साक्षी तंवर) से लड़का चाहते हैं। इस कोशिश में फ़ोगाट दंपति को चार लड़कियां हो जाती हैं, महावीर फ़ोगाट को लगता है कि अब उनका सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा और वह इस उम्मीद को ख़त्म कर देते हैं। फ़ोगाट अब कुश्ती के मुक़ाबले देखने से भी ख़ुद को अलग कर लेते हैं। तभी एक दिन गांव के कुछ मनचले लड़कों की… फ़ोगाट की दो बेटियां गीता और बबीता बुरी तरह पिटाई कर देती हैं और यहीं से महावीर फ़ोगाट का नज़रिया बदलता है।




यहां फ़िल्म का एक डायलोग बहुत शानदार है, ‘’गोल्ड तो गोल्ड होता है, छोरा लावे या छोरी’’…
फ़िल्म यहां से बदल जाती है, और अब महावीर फ़ोगाट को गीता और बबिता में ही उनका सपना दिखने लगता है। समाज और सबसे अलग जाते हुए फ़ोगाट गीता और बबिता को दूसरी लड़कियों से अलग बना देते हैं। गीता और बबिता को अच्छा पहलवान बनाने के लिए महावीर फ़ोगाट लड़कों के साथ कुश्ती लड़वाते हैं। जिसके बाद स्कूल में भी दोनों बेटियों को काफ़ी शर्मिंदगी महसूस करनी पड़ती है, ताने सुनने पड़ते हैं लेकिन फिर धीरे धीरे गीता राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बलाली का नाम रोशन कर देती हैं। गीता के बचपन का किरदार ज़ायरा वसीम और बबिता का सुहानी भटनागर ने निभाया है। इस फ़िल्म में गीता पर ज़्यादा फ़ोकस रखा गया है, और इस किरदार में जान डालने में ज़ायरा ने कहीं कोई कमी नहीं की है। बबिता यानी सुहानी ने भी लाजवाब अभिनय पेश किया है। ज़ायरा ने गीता के बचपन का रोल निभाते हुए अपने बात करने के तरीक़े से लेकर एक रौबदार रोल में शानदार दिखी हैं।

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अब कहानी आगे बढ़ती है, गीता और बबिता बड़ी हो जाती हैं। गीता के बड़े होने के बाद इस रोल में नज़र आईं हैं फ़ातिमा सना शेख़ और सानया मलहोत्रा ने बबिता का किरदार निभाया है। फ़िल्म यहां से रफ़्तार पकड़ लेती है और अब गीता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने के लिए बलाली से बाहर पटियाला में ट्रेनिंग लेने आ जाती हैं। जहां नई तकनीक और हाई फ़ाई पहलवानों के बीच गीता थोड़ी सी भटक भी जाती हैं और फिर उन्हें एक के बाद एक हार भी मिलने लगती है।

“दंगल” देखने के बाद सलमान खान की फैमिल बोली तुम्हारी “सुल्तान” से ज्यादा बेहतर आमिर की दंगल

इधर बबिता भी राज्य स्तर से अब राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच जाती हैं और वह भी गीता के साथ ट्रेनिंग के लिए पटियाला पहुंच जाती हैं। जहां वह गीता में बदलाव के बारे में उनसे बात करती हैं और फिर पिता महावीर फ़ोगाट के साथ मिलकर एक बार फिर गीता क़ामयाबी की ओर बढ़ने लगती हैं। आख़िरकार वह लम्हा आ जाता है जब महावीर फ़ोगाट की मेहनत रंग लाती है और उनका सपना साकार होता है। गीता 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की ओर से महिला कुश्ती में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला पहलवान बन जाती हैं।

दंगल ट्रेलर- पहलवान आमिर खान गोल्ड मेडल जीतने का सपना बेटियां. 

2 घंटे 50 मिनट लंबी इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त है, कहीं से भी दर्शकों को बोरियत महसूस न कराना। फ़िल्म में कॉमिक सीन और भावुक सीन की टाइमिंग इतनी शानदार है कि कब आप को हंसी भी आएगी और भावुकता पर आंख से आंसू भी छलक जाएंगे। बड़ी गीता का किरदार निभाने वाली फ़ातिमा सना शेख़ के लिए ये फ़िल्म मील का पत्थर साबित हो सकती है, उन्होंने अपने अभिनय से सभी का दिल जीत लिया है। तो सुपरस्टार आमिर ख़ान ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उन्हें क्यों कहा जाता है मिस्टर पर्फ़ेक्शनिस्ट, कहानी के हिसाब से ख़ुद को ढालने में माहिर आमिर ने इस फ़िल्म में भी महावीर सिंह फ़ोगाट के अभिनय को जिया है।
साथ ही साथ इस फ़िल्म के ज़रिए आमिर ख़ान ने बेटियों की ताक़त और देशप्रेम का एक शानदार संदेश भी दे दिया है। जो लोगों के दिलों में एक जज़्बा पैदा करता है।

बड़ी तोंद, चेहरे पर सफ़ेद और अधपक्की दाढ़ी के साथ माथे पर तनाव लिए आमिर में आपको सुपरस्टार नहीं बल्कि आंखों में सपने लिए महावीर सिंह फ़ोगाट ही नज़र आएंगे। ये फ़िल्म पिछले कुछ सालों की नहीं बल्कि आमिर ख़ान के करियर की सबसे शानदार फ़िल्मों में से एक है। अगर सच कहा जाए तो इस फ़िल्म में सिर्फ़ आमिर ख़ान ने ही नहीं बल्कि चारों लड़कियों (गीता और बबिता के बचपन और बड़े होने का किरदार निभाने वाली) फ़ातिमा सना शेख़, सानया मलहोत्रा, ज़ायरा वसीम और सुहानी भटनागर ने भी परफ़ेक्शन दिखाया है।

साक्षी तंवर को भी जितना रोल मिला है उसमें उन्होंने कमाल का अभिनय किया है। इसके अलावा फ़िल्म में हर एक छोटी और बारीक चीज़ों का ख़ास ध्यान रखा है निर्देशक नीतेश तिवारी ने। जिन्होंने इतने इत्मिनान से रेसलिंग के नियमों को दर्शकों को समझाने की कोशिश की है, साथ ही इंटरवल के बाद जिस अंदाज़ में उन्होंने फ़िल्म को रफ़्तार दिलाई है और अंतर्राष्ट्रीय मैचों में दिखाए गए मुक़ाबलों से रोमांच भरा है वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है।
फ़िल्म के एक सीन में ये दिखाया गया है कि जब गीता कॉमनवेल्थ गेम्स में फ़ाइनल मुक़ाबले (गोल्ड मेडल मैच) के लिए आती हैं तो उनके पिता महावीर फ़ोगाट को बहाने से कोच एक रूम में बंद करवा देते हैं ताकि मैच के दौरान वह गीता को दर्शक दीर्घा से कुछ कह या समझा न सकें, ताकि जीत का पूरा क्रेडिट कोच की ले जाएं।
इस बारे में हमने फ़िल्म के ठीक बाद गीता फ़ोगाट से बात की और जानना चाहा कि सच्चाई क्या है ? उस पर गीता ने भी कहा कि कोच को डर था जीत का श्रेय कहीं (पापा) महावीर फ़ोगाट को न चला जाए इसलिए उन्होंने वहां नहीं आने दिया, लेकिन रूम में बंद करने वाली बात को गीता ने इंकार कर दिया। साथ ही साथ उन्होंने ये भी कहा कि फ़िल्म में एक कोच को दिखाया गया है जबकि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान कोच की कई टीम थी हमारे साथ।

अंत में अगर आप इस फ़िल्म को सुलतान या सलमान ख़ान से तुलना कर रहे हैं तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। सुलतान अगर काल्पनिक कहानी थी तो ये महावीर फ़ोगाट के जीवन पर आधारित है। बहरहाल, आप फ़िल्म को देखना की सोच रहें तो सोचिए मत और ज़रूर देखने जाइए क्योंकि ये दूसरी फ़िल्मों से अलग है। खेल पर भारत में कई फ़िल्में बनी होंगी लेकिन इस फ़िल्म की बात निराली है, अंत में जब पदक जीतने के बाद देश का राष्ट्रध्वज लहराता है और राष्ट्रगान बजता है तो आप के रोंगटे भी खड़े हो जाते हैं और आप भी खड़े होकर तालियां बजाते हैं।

सैयद की स्याही से…

Khushboo Akhtar

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