निपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद कहाँ नहीं है ?

निपोटिज्म वाले आरक्षण के दम पे खुद जज बने और देश में आरक्षण ख़त्म करने के फैसले दे रहे थे.. किसी टुच्चे कॉलेज से LLB करके बार काउन्सिल में रजिस्ट्रेशन करवा लीजिये..  और कोई अन्य धंधा करने के साथ छुट-पुट केस लेते रहिये (भले जीतो या हारो)..

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16 जून 2020 @ 12:04
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Sushant Singh

निपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद कहाँ नहीं है ? कॉलेज में अध्यापक अपने सजातीय स्टूडेंट्स के नंबर वाइवा मे बड़वा देते हैँ। पढ़ाई ख़त्म करके जब लड़का /लड़की नौकरी के लिए लोगों को अपना बायो-डाटा अपने सीनियर्स को भेजते हैँ तब सीनियर उनकी जाती देख के आगे भेजता या रोकता है। प्राइवेट कंपनियों के टॉप मैनेजर्स हमेशा एक ही विचारधारा के होते हैँ, ये कोई संयोग नही है, ये षणयंत्र है। अगर सरकारी नौकरी है तो इंटरव्यू एक अलग ही गेम है फिर तो। वहाँ तो सवर्ण-पिछड़ा-दलित सबसे ज्यादा होता है।

पहले IIT में भी वाइवा होता था और लिखित परीक्षा में अच्छे नंबर लाने वाले स्टूडेंट्स को भी फेल कर दिया जाता था.. सोचिये एक वैज्ञानिक की भाषा ज्यादा जरुरी है या उसका ज्ञान ? फिर हम कहते हैँ भारत ने कोई अविष्कार क्योँ नही किया..  दलित पिछड़ों ने सबसे ज्यादा इसका दंश झेला है...  उसे सरकार ने ख़त्म किया..  UPSC ने इंटरव्यू में फेल करने का ऑप्शन ही हटा दिया..  क्योंकि टॉपर को अगर इंटरव्यू में 33% नंबर  भी दे दें तो टोटल मार्क्स के आधार पे मेरिट में आ जाये लेकिन फेल किया तो सीधा बाहर..  

न्यायपालिका का तो ये हाल है कि सिर्फ 121 परिवारों के बेटे -दामाद ही जज बन रहे हैँ..  यूनिवर्सिटी आरक्षण पे फैसला देने वाले जज ललित ने अपने जीवन में कोई परीक्षा पास नही की, उनके पिता दिल्ली हाई-कोर्ट के जज थे, निपोटिज्म वाले आरक्षण के दम पे खुद जज बने और देश में आरक्षण ख़त्म करने के फैसले दे रहे थे.. किसी टुच्चे कॉलेज से LLB करके बार काउन्सिल में रजिस्ट्रेशन करवा लीजिये..  और कोई अन्य धंधा करने के साथ छुट-पुट केस लेते रहिये (भले जीतो या हारो).. और 10 साल बाद ऊपर बैठे पापा -जीजा -बाबा के सजातीय दोस्त आपको इस देश की जनता के भाग्य का फैसला करने वाले जज बना सकते हैँ..कोई परीक्षा नही  फिर कहिये कि भाई-भतीजावाद गलत है..  ..  ये इस देश की विडम्बना है। 

ऐसा नही है कि दलित-मुस्लिम -पिछड़े निपोटिज्म नही करते..  जिस व्यक्ति ने जिंदगी के हर मोड पे भेदभाव झेला हो..  जब वो कुर्सी पे बैठेगा तो उसका स्वाद दूसरों को चखायेगा..  वो भी गलत है.. फ़िल्म जगत, संगीत और साहित्य में छोटा कलाकार तो बड़े प्रोड्यूसर, डाइरेक्टर से पहले उसके असिस्टेंट से होके गुजरना पड़ता है..  हिंदी साहित्य में आजादी से आज तक जातिवाद चरम पे है..  चाहो तो इसमें दिए गए अवार्ड के नाम देखिये सिर्फ 2-3 ही जातियों को मिले हैँ..  तेंदुलकर को भारत रत्न मिल गया, फ़िल्म भी बन गयी लेकिन मेजर ध्यानचंद में क्या खराबी थी..  उन्हें आज तक नही मिला.. 

फ़िल्मी दुनियां में जातिवाद चलता है लेकिन स्वार्थ उस से ऊपर है..  हर आदमी अपनी परिवार, जाती-धर्म की तरफ झुकाव रखता है,  लेकिन जब उसका कद खुद से बढ़ा होने लगे तो जलने भी लगता है.. इरफ़ान खान के साथ कितने खान्स ने काम किया ? नवाजुद्दीन के साथ कर लेंगे क्योंकि वो स्टारडम नही छीन लेगा ना.. नवाज दूसरा शाहरुख सलमान नही दिखता लेकिन इरफ़ान खान दिखते थे। यही असली जड़ है.. जो नौकरी वगैरह के मामले से फ़िल्मी दुनियां को अलग करता है..  

ये पूर्ण स्वार्थ है. राकेश रौशन, रणधीर -शम्मी कपूर परिवार, एकता कपूर से पहले भी जेपी दत्ता, रमेश सिप्पी, इक़बाल, सुभाष घई के समय भी निपोटिज्म था.. ये सामाजिक बुराई है..  नीचे वाले लोग इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते क्योंकि भेड़ के शाकाहारी होने से कुछ नही होगा ..  शेर मांस खाना छोड़े तो जंगल में शांति आये..

 (यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं, जिसके लिए पल पल न्यूज़ उत्तरदायी नहीं है। )

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