‘मैं भी हारी हुई लड़ाई लड़ रहा हँ, आप भी लड़िए,’ रवीश कुमार

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कई बार उम्मीदें ज़रूरत से ज़्यादा बोझ डाल देती हैं। हर आंधे घंटे पर कोई फोन पर होता है, उसकी कहानी अर्जेंट भी होती है और दर्दनाक भी, पर मैं तो अकेला ही होता हूं।



सबकी बात इसी से ख़त्म होती है कि आप ही से उम्मीद है। मैं किससे उम्मीद करूं। मैं किसकी तरफ़ देखूं। ना कहते कहते अपराध बोध से घिर जाता हूं। एक तो बोलने के लिए बुलाने वालों ने रूला दिया है और दूसरा अपनी व्यथा सुनाने वालों ने। न तो क्षमता है न संसाधन। किस किस की स्टोरी करूँ। फोन पर सुनते सुनते कान में दर्द हो गया है।

व्हाट्स अप खोले तो लोग पहले से घेरने के लिए मौजूद रहते हैं। पता नहीं यह किस वजह से हो रहा है। क्या बाकी चैनलों में पत्रकारों ने लोगों से मिलना बंद कर दिया है? क्या वहां लोगों की स्टोरी नहीं हो रही है? कई बार ऐसे लोग मिलते हैं जिनकी स्टोरी अखबारों में कवर हो चुकी होती है, मगर कोई असर नहीं होता।



आज एक किसान चुरू से चले आए। मैं घड़ी देखता हुआ भागा जा रहा था। उसके पहले चार लोग दो सौ पन्ने का दस्तावेज़ लेकर घेरे हुए थे। एक पेज लेकर समझाने लगे। एम्स के डाक्टर जैसी हालत हो गई है। मुझे पता है कि आपको उम्मीद है, मुझे यह भी पता है कि मैं सबकी उम्मीद पूरी नहीं कर सकता। ना कह देता हूं, मगर ना कहने की प्रक्रिया इतनी सामान्य नहीं है। कहते हुए भी बुरा होता है, दूसरी तरफ की आवाज़ मायूस होने लगती है और फोन बंद करने के बाद नींद से लेकर हंसी तक ग़ायब हो जाती है।

थोड़ा सोचिएगा। हो सके तो मुझे कुछ दिनों के लिए अकेला छोड़ दीजिए। अपनी लड़ाई ख़ुद लड़िए। मैं भी हारी हुई लड़ाई लड़ रहा हूं. आप भी लड़िए।

(इस लेख को रवीश कुमार के फेसबुक पेज से लिया गया है।)

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