जयललिता, मीडिया और कहानी-पढिये दिलिप खान की एक कहानी

जयललिता, मीडिया और कहानी-पढिये दिलिप खान की एक कहानी

ई-टीवी ने जब घंटे भर पहले जयललिता की मौत की ख़बर दिखाई तो मुझे एक कहानी याद आई। उड़िया कहानीकार रमाकांत रथ की एक कहानी। शीर्षक फ़िलहाल याद नहीं आ रहा। कहानी में एक बड़े नेता की तबीयत बिगड़ती है तो मीडिया वालों के कान खड़े हो जाते हैं। एक डूबते अख़बार का रिपोर्टर अपने संपादक को विश्वास में लेता है और बताता है कि आज रात नेताजी गुजर जाएंगे। संपादक आनन-फ़ानन में समूचा पहला पन्ना उस नेता से जुड़ी ख़बरों से भर देता है। इंतज़ार करता रहता है कि नेताजी का हुआ क्या? रिपोर्टर की हालत ख़राब।

नेताजी की तबीयत गंभीर थी, लेकिन नेताजी मौजूद थे। संपादक बार-बार रिपोर्टर को फोन करता है और बेचैनी बढ़ती जाती है। अख़बार छपने का वक़्त होने को चला, लेकिन नेताजी गंभीर बने रहे। रिपोर्टर और संपादक अब दुआ करने लगते हैं कि अख़बार की ख़ातिर नेताजी की मौत हो जाए। आख़िरकार प्रेस में भेजने से पहले नेताजी दुनिया छोड़ जाते हैं और इन दोनों के चेहरे पर तसल्ली आती है।

जयललिता को छोड़िए, वो तो बेहद क्रिटिकल हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जब बीमार हुए थे, उसी वक़्त सभी चैनलों ने घंटे-घंटे भर का प्रोग्राम तैयार कर लिया था। वो आज तक बेकार पड़ा हुआ है। ज़रूर उस दिन संपादक निराश हुए होंगे। जिस दिन अटल बिहारी गुजरेंगे, देखिएगा आधे घंटे के भीतर कितनी लंबी-लंबी डॉक्यूमेंट्री और रिपोर्ट्स टीवी पर चलने लगेगी!

 

ये पोस्ट दिलिप खान के फेसबुक पेज से ली गई है

 

Nadeem Akhtar

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