समाज के दोगले लोगों की सोच पर जोरदार तमाचा है ‘पिंक’

समाज के दोगले लोगों की सोच पर जोरदार तमाचा है ‘पिंक’

‘पिंक’ एक ऐसी फिल्म है जो समाज की दोयम दर्जे की मानसिकता को ना सिर्फ दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि अगर कोई लड़की ना बोलना जानती है तो फिर उसके चरित्र पर किस तरीके से कीचड़ उछाला जाता है.

‘पिंक’ आपको अपने लिए आवाज़ उठाने का जज्बा भी देती है क्योंकि 21वीं सदी में दाखिल होने के वाबजूद आज भी हमारे समाज में लड़कियों पर ढेरों पाबंदियां हैं और हर हाल में लड़कियों को ही दोषी ठहराया जाता है. लड़के खुद कितने भी कुकर्म करते फिरें, लेकिन लड़कियां उन्हें वर्जिन ही चाहिए.

यदि लड़की आत्मनिर्भर है, रात को आना-जाना करती है तो वह निश्चय ही सेक्स वर्कर है, यही माना जाता है. अगर रात को लड़की कहीं जा रही है तो हमारे सभ्य समाज के लोगों की गाड़ी के शीशे खुदबखुद नीचे हो जाते हैं, हालांकि ये ख्याल दिन में नहीं आता.

लड़कियों के स्कर्ट पहनने से किसे खतरा?

अगर कोई लड़की स्कर्ट पहनती है, शराब पीती है, सिगरेट पीती है, हंस कर बात करती है, तो वह आपको लाइन दे रही है. इस तरह की लड़कियां कुछ लड़कों के हिसाब से चालू होती हैं. लड़कियों को तो लड़कों से दोस्ती करनी ही नहीं चाहिए. अगर कर ली और गलती से भी वे किसी पार्टी में चली गईं तो उन्हें तो लड़कों के साथ सोने के लिए तैयार माना जाता है.

हमारे समाज की सोच है कि अगर लड़के शराब पीते हैं तो वह उनकी सेहत के लिए अच्छा है. कुछ परिवार तो यहां तक मानते हैं कि इससे स्टेटस बढ़ता है. लेकिन यही काम यदि लड़की ने किया तो उसका ही नहीं उसके परिवार का चरित्र भी खराब हो जाता है.

यह तस्‍वीर फिल्‍म पिंक के आफिसयल पोस्‍टर से ली गई है.

समाज की नज़र में जो लड़कियां अकेली रहती हैं, देर रात तक बाहर काम करती हैं, अपने हिसाब से कपड़े पहनती हैं, वे समाज के लड़कों को बिगाड़ती हैं. लड़कियों के स्कर्ट पहनने से लड़कों को खतरा हैं, वे बहक जाते हैं और उत्तेजित हो जाते हैं (यानी एक तरह से लड़कियों की बजाय लड़कों को हिफाज़त की जरूरत हुई!).

‘बंदी को उसकी औकात दिखानी ही चाहिए’

हमारे समाज के दोगले लोगों का मानना है कि लड़कियों को आज़ादी दी ही नहीं जानी चाहिए, अगर कोई लड़की आज़ाद है और उसे ना बोलना आता है तो फिर उसके साथ रेप ही होना चाहिए. (फिल्म के एक संवाद के मुताबिक ‘बंदी को उसकी औकात दिखानी ही चाहिए’) समाज के इसी सोच पर जोरदार तमाचा है यह फिल्म.

पहले बात फिल्म की स्टार कास्ट की करते हैं, अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, एंड्रिया टेरिंग, कीर्ति कुलिहाडी, अंगद बेदी और पीयूष मिश्रा फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं. अमिताभ बच्चन एक परिपक्व और मंजे हुए कलाकार हैं. आशा के अनुरूप इस फिल्म में जिस तरह के ठहराव के साथ उन्‍होंने एक वकील का किरदार अदा किया, वो आपको सिनेमा से बाहर निकलने के बाद भी याद रहता है.

पीयूष मिश्रा की दमदार एक्टिंग

बात तापसी पन्नू की करें तो ‘चश्मे-बद्दूर’ फिल्म में जहां वे एक चुलबुली शरारती लड़की के किरदार में थी वहीं इस फिल्म में शुरुआत से ही तापसी बेहद गंभीर रहीं. कीर्ति कुलिहाडी की बात की जाए या फिर एंड्रिया की सब बेहद ही सहज तरीके से अपने किरदार को निभा रहे थे.

हां, जिसका किरदार आपको गुस्सा दिलाता है, जिसकी दलीलें आपको गुस्सा दिलाती हैं वे हैं पीयूष मिश्रा, जो अंगद बेदी के वकील होते हैं. यह ग़ुस्सा ही उनके अभिनय की सफलता का और संवादों के असल सबूत है.

फिल्म की कहानी की बात की जाए तो ये तीन सहेलियों की कहानी है जो देश के अलग-अलग हिस्सों से आकर दिल्ली में रहती हैं और आत्मनिर्भर हैं. एक दोस्त के ज़रिए वो जो कुछ लड़कों से मिलती हैं, जिनमें राजबीर (अंगद बेदी) एक रसूखदार परिवार का लड़का है.

अमिताभ बच्चन ने फिर चौंकाया

लड़कों की ही गुजारिश करने पर वे उनके साथ डिनर पर एक रिज़ोर्ट में जाती है और वहां पर अलग-अलग तरीके से उनके साथ बदसलूकी की कोशिश होती है. अपने बचाव में मीनल (तापसी पन्नू) राजबीर के सिर पर बोतल से वार कर देती है. बस वहीं से उनके लिए मुसीबतें खड़ी हो जाती हैं.

PIC : NEWS18

पहले डराने की कोशिश होती है, घर से बेघर करने की कोशिश होती है. यहां तक कि सेक्स वर्कर तक साबित कर दिया जाता है, जिसकी वजह से फलक की नौकरी तक चली जाती है. फिर भी, हिम्मत करके वे पुलिस तक पहुंचती हैं, लेकिन हकीकत ये भी है कि हमारी पुलिस ‘गोली की तरह’ (फिल्म में इस्तेमाल डायलॉग) काम करती है और रसूखदारों के दबाव में, लड़कियों को ही धंधा करने वाली साबित करने में लग जाती है.

इंटरवल से पहले आपको फिल्म थोड़ी धीमी लगेगी और बोर करेगी, लेकिन बाद में ये आपको हर सेकेंड बांध कर रखती है. कोर्ट में पुलिस की तत्परता की जो फज़ीहत उड़ती है वो और कोर्ट में अमिताभ बच्चन और पीयूष मिश्रा की दलीलें, ख़ासकर दोनों के बीच जो जिरह फ़िल्माई गई है, वह माहौल बांध देती है.

ये है कमजोर प्वाइंट

फिल्म में संगीत के प्रेमियों को थोड़ी निराशा हाथ लगेगी, क्योंकि फिल्म में ज्यादा गाने नहीं हैं. वैसे फ़िल्म की कहानी में उनकी गुंजाइश भी नहीं थी. लेकिन मुंबइया फिल्मों को बिना गानों के पूरा ही नही माना जाता. इसलिए उस लिहाज़ा से बिना संगीत के भी यह फिल्म आपको हर सेंकेंड के लिए बांधे रखती है, और यह इसका एक टर्निंग प्वाइंट है. वैसे फ़िल्म में संगीत कतई न हो, ऐसा भी नहीं है. फिल्म का ‘काली-काली रैनी…’ गाना लोगों की जुबान पर पहले से ही चढ़ा हुआ है.

फिल्म का निर्देशन बेहतर है कुछ जगहों पर फिल्म आपको धीमेपन की वजह से बोर करती है. कुछ किरदार अनावश्यक भी लगते हैं. मसलन, फिल्म में अमिताभ बच्चन की वाइफ नहीं भी होती तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता. अमिताभ का जरूरत से ज्यादा शांत रहना बोर करता है. तापसी को लीड रोल में दिखाया जरूर गया, उसने ही राजबीर को बोतल भी मारी. लेकिन कृति का काम तापसी से कहीं ज्यादा बोल्ड नजर आता है.

परिवार को चलाना हो, नौकरी चले जाना हो या फिर मोहब्बत में धोखा, हर जगह कृति की भूमिका बेहतर तरीके से बुनी गई है. एंड्रेया को ज़रूरत से कम जगह दी गई है. उसके किरदार को थोड़ी और जगह देकर नार्थ-ईस्ट की लड़कियों को जिस तरह से आसानी से अवेलेबल समझा जाता है उस सोच पर भी जोरदार तरीके से तमाचा लगाया जा सकता था.

कुल मिलाकर देखा जाए तो यह फ़िल्म लड़कों और लड़कियों को खास तौर से देखनी चाहिए. लड़कियों की वर्जिनिटी पर सवाल करने वालों को बेहतर तरीके से जवाब दिया गया है. अपनी मर्जी से जीने की आज़ादी और खुल कर जीने का ख्याल अगर आप रखते हैं तो फिल्म ज़रूर देखिए मेरी तरफ से फिल्म को 5 में से 4 नंबर.

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