क्या प्रिंस अल वलीद की गिरफ्तारी से भारतीय शासक सबक लेंगे

क्या प्रिंस अल वलीद की गिरफ्तारी से भारतीय शासक सबक लेंगे

दुनिया के मशहूर खरबपति प्रिंस अल वलीद की गिरफ्तारी से दुनिया के व्यापारी वर्ग हिल गए हैं। वैश्विक कम्पनियों पर आर्थिक नुक्सान की तलवार लटक रही है, प्रिंस अल वलीद की पूरी दुनिया में पूंजी लगी हुई है, उन्होंने कभी अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सहायता की थी और ट्रम्प को आर्थिक संकट से निकालने के लिए उनकी कम्पनियों में निवेश तक किया था।

प्रिंस की सिर्फ गिरफ्तारी ही नहीं हुई, बल्कि उनकी संपत्ति को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित कर दिया गया है। हालांकि वलीद अकेले ऐसी शख्सियत नहीं हैं, जिन पर ऐसी गाज गिरी है, या फिर ऐसी गिरफ्तारी हुई है। वलीद के साथ 11 ऐसे लोग शामिल हैं जो मंत्री के पद पर थे, सुरक्षा की अहम जिम्मेदारियोंं का निर्वहन कर रहे थे। इनमें एक तो मीडिया मालिक भी है, जिसकी धाक सऊदी अरब में उल्लेखनीय थी।

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दुनिया को अचंभित करने वाली इस कार्रवाई का आधार भ्रष्टाचार है, पर दुनिया के टिप्पणीकारों का मत है कि सऊदी अरब के शाह ने अपने बेटे की सत्ता स्थिति को मजबूत करने और जनता में फैले आक्रोश को कम करने के लिए यह कार्रवाई की है। कारण जो भी हो, पर यह कार्रवाई न केवल अरब दुनिया के लिए आश्चर्यजनक है बल्कि शेष दुनिया के लिए भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। सऊदी अरब ने यह साबित करने की कोशिश की है कि वह ताकतवर व्यापारी वर्ग को जमींदोज कर सकता है, उसकी संपत्ति को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर सकता है, जो न केवल अपनी संपत्ति की शक्ति से शासकों को उंगलियों पर नचाने के लिए जाने जाते हैं और जिसके सामने शासक भी नतमस्तक होते हैं।




सऊदी अरब अभी कई संकटों से घिरा हुआ है, उसके सामने अपने वर्चस्व को स्थापित रखने की चुनौतियां खड़ी हैं। उसे न केवल बाहरी  बल्कि आंतरिक संकट भी है। उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब अपने आप को अरब दुनिया का अगुवा मानता है, वह एक सुन्नी देश है और अरब सुन्नी बहुल क्षेत्र ही है लेकिन ईरान जैसे देशों से उसके वर्चस्व को चुनौती मिलती है, जबकि शिया आतंकवादी संगठनों की भी चुनौती का उसे सामना करना पड़ता है, शिया आतंकवादी संगठन अरब में शाह शासन को हिंसक चुनौती देने के लिए सक्रिय रहे हैं, सऊदी अरब ने कई शिया विचारकों को आतंकवादी मानकर मौत की सजा सुनाई है फिर भी शिया आतंकवादी संगठनों की सक्रियता कम नहीं हुई है।

सबसे बड़ी बात यह है कि आंतरिक स्तर पर बड़ी खतरनाक स्थिति उत्पन्न हो गई है। तेल कम्पनियां बाहरी लोगों को रोजगार तो देती हैं, पर स्थानीय लोगों को नजरअंदाज कर देती हैं। जब तेल कम्पनियां बाहर के प्रोफैशनल्स को आमंत्रित कर रोजगार देंगी और स्थानीय प्रोफैशनल्स को नजरअंदाज कर देंगी तो फिर सऊदी अरब में बेरोजगारों की स्थिति बड़ी खतरनाक होना निश्चित है। सच भी यही है कि सऊदी अरब में बेरोजगारी भी चरम पर पहुंची है, बेरोजगार नागरिकों का शाह शासन से विश्वास भी डिगा है। नरेन्द्र मोदी पर रिलायंस और अडाणी को लाभ पहुंचाने के आरोप लगे हैं, उनकी आलोचना के लिए अंबानी और अडाणी को ढाल बनाया जाता है।

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सऊदी अरब में भी उद्योग और कार्पोरेट जगत के लोगों के खिलाफ आक्रोश भड़कता रहता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सऊदी अरब सहित कई अरब देशों के अमीरों के पैसे पर यूरोप की अर्थव्यवस्था तक चलती है। लीबिया के पूर्व तानाशाह कर्नल गद्दाफी और उसके बेटों के कालेधन से यूरोप के एक महत्वपूर्ण देश की अर्थव्यवस्था टिकी हुई थी, जहां पर लीबिया की जनता के पैसों को लूट कर अघोषित निवेश किया गया था। यही कारण था कि यूरोप के कई देश गद्दाफी के पक्ष में अप्रत्यक्ष तौर पर खड़े रहते थे। इसी तरह का आरोप खरबपति प्रिंस अल वलीद पर लगा है।




पहले प्रिंस अल वलीद सिर्फ  सऊदी अरब में तेल कम्पनी का मालिक था और तेल उत्खनन का कार्य करता था। तेल उत्खनन कार्य से अर्जित वैध और अवैध कमाई से ही उसने अपना व्यापारिक साम्राज्य खड़ाकिया था। अरब देशों की विडंबना भी है कि जो व्यापारी उन्हें लूटते हैं, उनके तेल और गैस सम्पदा का दोहन करते हैं, वे उनके लिए कोई सामाजिक जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं। ये खरबपति तो सिर्फ अमरीका और यूरोप में अपने पैसों से मौज-मस्ती करते हैं। सऊदी अरब के शासक शाह सलमान अपनी उम्र के अंतिम दौर से गुजर रहे हैं। इस पड़ाव पर वह अपने उत्तराधिकारी की सत्ता स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं, सऊदी अरब की छवि दुनिया में सुधारना चाहते हैं।

दुनिया में सऊदी अरब की स्थिति कोई अच्छी नहीं है, कोई आदर्श स्थिति सिर्फ  और सिर्फ  एक कट्टर इस्लामिक देश की है जो कट्टरवादी रूढिय़ों को हिंसक तौर पर सक्रिय तथा मानवाधिकारों की कब्र खोदकर रखता है। शाह सलमान ने ऐसी लोमहर्षक स्थिति को आदर्श स्थिति में बदलने की कोशिश की है। शाह सलमान ने महिलाओंं को कार चलाने तक की स्वीकृति दे दी है। महिलाएं भी अब स्थानीय चुनावों में खड़ी हो सकती हैं। ऐसे कई सुधारों को उन्होंने लागू किया है, जिसके लिए दुनिया में उन्हें वाहवाही भी मिली है और यह उम्मीद भी की जा रही है कि सऊदी अरब भी इस्लामिक रूढिय़ों की कट्टरता से मुक्त होकर एक न एक दिन महान देश बनेगा।

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खरबपति प्रिंस अल वलीद, सेना और मंत्री पद पर बैठे कई लोगों को जेल में डालने तथा इनकी संपत्ति को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की शक्ति प्रदर्शित करने से एक ओर शाह सलमान की वाहवाही हो रही है, तो दूसरी ओर उनके उत्तराधिकारी क्राऊन प्रिंस की स्थिति भी मजबूत हुई है। शाह सलमान ने अपने बड़े भाई के पुत्र, जो गृह और रक्षा मंत्री का दायित्व संभालता था और जो स्वाभाविक तौर पर शाह सलमान का उत्तराधिकारी माना जाता था, को नजरअंदाज कर अपने पुत्र क्राऊन प्रिंस को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है। इसलिए सेना और सत्ता की कई शक्तियां नाराज भी थीं और उनमें आक्रोश भी था। क्राऊन पिं्रस भ्रष्टाचार विरोधी समिति के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने ही यह कार्रवाई की है।

खरबपति की गिरफ्तारी और उनकी संपत्ति को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की कार्रवाई को भारतीय पक्ष में किस रूप से देखा जा सकता है। सऊदी अरब ने यह वीरता तो दिखाई है, पर भारत में क्या ऐसी वीरता की उम्मीद की जा सकती है? कदापि नहीं। क्या कोई भारतीय शासक अंबानी-अडाणी पर हाथ डालने तक की कोशिश कर सकता है? देश में अंबानी-अडाणी सहित सभी प्रकार के कथित लुटेरे उद्योगपतियों पर कार्रवाई करने और उनकी संपत्ति जब्त करने की मांग उठती रही है। काश! कोई शासक भारत में भी पैदा होता, जो खरबपति प्रिंस अल वलीद जैसे हश्र को सुनिश्चित करने की वीरता दिखाता

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