नई पीढ़ी आजाद को कितना जानती है ?

उन्होंने अपने समय के मुस्लिम नेताओं की भी आलोचना की जो उनके अनुसार देश के हित के समक्ष साम्प्रदायिक हित को तरज़ीह दे रहे थे

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पल पल न्यूज़ वेब डेस्क
Monday, November 11, 2019 - 16:20

आज जा इतिहास:

आज भारत राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मना रहा है.आज ही के दिन सन 1888 में महान स्वतंत्रता सेनानी एवं आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्म हुआ था. उन्हीं के जन्मदिन पर हर साल 11 नवंबर को भारत में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है.  सितंबर 11 2008 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यह फैसला लिया था कि 11 नवंबर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रुप में मनाया जाना चाहिए.
2008 से हर साल 11 नवंबर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रुप में मनाया जाता है.मौलाना आजाद को स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद्, लेखक एवं इस्लामिक स्कालर के रुप में भी जाना जाता है.
मौलाना अबुल कलाम आजाद एक शिक्षाविद् तो थे ही साथ ही एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे. स्वतंत्रता संग्राम के समय वो ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से एक थे. शिक्षा मंत्री रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति की स्थापना की थी. उनका मुख्य लक्ष्य प्राइमरी शिक्षा को बढ़ाना था. 
मौलाना आजाद  आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले से 1952 में सांसद चुने गए और भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने. 
आजाद भारत के शिक्षा मंत्री रहते हुए मौलाना आजाद ने राष्‍ट्रीय शिक्षा प्रणाली बनाई. मुफ्त प्राथमिक शिक्षा उनका मुख्‍य उद्देश्‍य था. इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍लोनॉजी  और विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग की स्‍थापना का श्रेय मौलाना आजाद को ही जाता है. 
 उन्‍होंने शिक्षा और संस्‍कृति के विकास के लिए संगीत नाटक अकादमी (1953), साहित्य अकादमी (1954) और ललितकला अकादमी (1954) जैसे उत्‍कृष्‍ट संस्‍थानों की भी स्‍थापना की. 
शिक्षा के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए मौलाना आजाद को मरणोपरांत साल 1922 में भारत के सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान भारत रत्‍न से सम्‍मानित किया गया.     
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद एक प्रसिद्ध भारतीय मुस्लिम विद्वान के साथ ही एक  कवि, लेखक और पत्रकार  भी थे.
वे महात्मा गांधी के सिद्धांतो का समर्थन करते थे. उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए कार्य किया, तथा वे अलग मुस्लिम राष्ट्र (पाकिस्तान) के सिद्धांत का विरोध करने वाले मुस्लिम नेताओ में से थे.
खिलाफत आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. 1923 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे कम उम्र के प्रेसीडेंट बने. वे 1940 और 1945 के बीच कांग्रेस के प्रेसीडेंट रहे.
वे धारासन सत्याग्रह के अहम इन्कलाबी (क्रांतिकारी) थे. वे 1940-45 के बीच भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे जिस दौरान भारत छोड़ो आन्दोलन हुआ था. कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं की तरह उन्हें भी कई साल जेल में बिताने पड़े थे.
मौलाना आज़ाद अफग़ान उलेमाओं के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे. उनकी माँ अरबी मूल की थीं और उनके पिता मोहम्मद खैरुद्दीन एक फारसी (ईरानी, नृजातीय रूप से) थे. मोहम्मद खैरुद्दीन और उनके परिवार ने भारतीय स्वतंत्रता के पहले आन्दोलन के समय 1857 में कलकत्ता छोड़ कर मक्का चले गए. वहाँ पर मोहम्मद खॅरूद्दीन की मुलाकात अपनी होने वाली पत्नी से हुई. मोहम्मद खैरूद्दीन 1890 में भारत लौट गए. मौहम्मद खैरूद्दीन को कलकत्ता में एक मुस्लिम विद्वान के रूप में ख्याति मिली. जब आज़ाद मात्र 11 साल के थे तब उनकी माता का देहांत हो गया. उनकी आरंभिक शिक्षा इस्लामी तौर तरीकों से हुई. घर पर या मस्ज़िद में उन्हें उनके पिता तथा बाद में अन्य विद्वानों ने पढ़ाया. इस्लामी शिक्षा के अलावा उन्हें दर्शनशास्त्र, इतिहास तथा गणित की शिक्षा भी अन्य गुरुओं से मिली. आज़ाद ने उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी, अरबी तथा अंग्रेजी़ भाषाओं में महारथ हासिल की. सोलह साल उन्हें वो सभी शिक्षा मिल गई थीं जो आमतौर पर 25 साल में मिला करती थी.
तेरह साल की आयु में उनका विवाह ज़ुलैखा बेग़म से हो गया. वे देवबन्दी विचारधारा के करीब थे और उन्होंने क़ुरान के अन्य भावरूपों पर लेख भी लिखे. आज़ाद ने अंग्रेज़ी समर्पित स्वाध्याय से सीखी और पाश्चात्य दर्शन को बहुत पढ़ा. उन्हें मुस्लिम पारम्परिक शिक्षा को रास नहीं आई और वे आधुनिक शिक्षावादी सर सैय्यद अहमद खाँ के विचारों से किसी हद तक सहमत थे.
आजाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ थे. उन्हेंने अंग्रेजी सरकार को आम आदमी के शोषण के लिए जिम्मेवार ठहराया. उन्होंने अपने समय के मुस्लिम नेताओं की भी आलोचना की जो उनके अनुसार देश के हित के समक्ष साम्प्रदायिक हित को तरज़ीह दे रहे थे. अन्य मुस्लिम नेताओं से अलग उन्होने 1905 में बंगाल के विभाजन का विरोध किया और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के अलगाववादी विचारधारा को खारिज़ कर दिया. उन्होंने ईरान, इराक़ मिस्र तथा सीरिया की यात्राएं की। आजाद ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना आरंभ किया और उन्हें श्री अरबिन्दो और श्यामसुन्हर चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारियों से समर्थन मिला.
आज़ाद राजनीति के प्रति उनके झुकाव के कारण पहले पत्रकार बने. उन्होने 1912 में एक उर्दू पत्रिका अल हिलाल का सूत्रपात किया. उनका उद्येश्य मुसलमान युवकों को क्रांतिकारी आन्दोलनों के प्रति उत्साहित करना और हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देना था. उन्होने कांग्रेसी नेताओं का विश्वास बंगाल, बिहार तथा बंबई में क्रांतिकारी गतिविधियों के गुप्त आयोजनों द्वारा जीता. उन्हें 1920 में राँची में जेल की सजा भुगतनी पड़ी.आज नई पीढ़ी आजाद के कारनामों से बहुत जादा वाकिफ नहीं,जो इस बात का भी सुबूत है कि हम भारतीय अपने पुरखों की कुर्बानियों को भुलाने में बड़े ही दयालू हैं .

प्रस्तुति:शाहिदुल इस्लाम 

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