8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे जब मोदी ने कहा मित्रों ...

नोटबंदी के बाद सरकार के इस क़दम के शिकार होने वाले १०० से अधिक लोगों की जान चली गई थी

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पल पल न्यूज़ वेब डेस्क
8 नवंबर 2019 @ 15:19

आज जा इतिहास: नोटबंदी की तीसरी बरसी पर विशेष
नई दिल्ली: भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया में छोटे रूप में नोटबंदी कहा गया, की घोषणा 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे  भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किये गए संबोधन के द्वारा की गयी. यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया. इस घोषणा में 8 नवम्बर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया.  इसका उद्देश्य केवल काले धन पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था. .

काले धन को सफ़ेद करने  के  दौरान बड़ा खेल खेला गया, जिस का सुबूत यह माना गया कि ५०० एवं १००० हज़ार के जितने भी नोट थे,अधिकांश वापिस बैंक में जमा कराये गए ,जो इस बात को दर्शाता है कि कला धन एक तरह से सफ़ेद हो गया.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ट्वीट को रीट्वीट कर दिया जिसमें ममता ने केंद्र के फैसले को कठोर कहा था. केजरीवाल ने 12 नवम्बर को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि नोटबंदी के नाम पर देश में 'बड़े घोटाले' को अंजाम दिया गया. सरकार ने कुछ लोगों को पहले ही आगाह कर दिया था. पिछले तीन महिनों के बैंकों में हजारों करोड़ रुपये जमा कराए गए। बैंक में जमा कराई गई इतनी बड़ी रकम से शक पैदा होता है,यह केजरीवाल ने कहा था.

केरल की माकपा नीत एलडीएफ सरकार ने सरकार के आकस्मिक ऐलान की आलोचना करते हुए कहा था कि इस कदम से देश से काला धन खत्म नहीं होगा. केरल के वित्त मंत्री टी एम थोमस इसाक ने कहा कि 1000 और 500 के नोटों को बंद करना काले धन की समस्या का निवारण नहीं है. पूरा काला धन इस रूप में नहीं होता. बहुत सारा धन विदेशों में जमा है और हवाले के रास्ते से आता है.

नोटबन्दी का विरोध करने वाले दलों (कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम आदि) ने 28 नवम्बर को भारत बन्द का आह्वान किया था जो सफल नहीं हुआ था.कई सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारत की अधिकांश जनता ने इस विमुद्रीकरण की घोषणा का स्वागत किया था तथा वे इसके सकारात्मक प्रभावों के प्रति आशान्वित थे किन्तु बाद में उनको बड़ी निराशा हाथ आ गई .कारण था काले धन  का पकड़ में नहीं आना एवं  जो दुसरे  उद्देश्य  बताये गए थे,उनकी प्राप्ति में कामियाबी का हासिल ना होना .

नोट बंदी के जमाने में आयकर विभाग तथा अन्य विभागों ने जगह-जगह छापे  भी मारे जिसमें भारी मात्रा में पुराने तथा नये नोट मिले. इसमें कई बैंक अधिकारियों की मिलीभगत का भी पर्दाफाश हुआ. इसी क्रम में सरकार द्वारा लाइ गई स्कीम स्वैच्छिक घोषणा योजना (आईडीएस) के तहत गुजरात के महेश शाह ने 13,800 करोड़ के ऊपर काले धन का ख़ुलासा किया था. साथ ही गुजरात में सुरत के किशोर भजियावाले नाम के चाय और पकौड़ी बेचने वाले के पास से 1000 करोड़ का कालाधन बरामद किया गया था. अनेक बाजारों में दुकानों को आईटी (इनकम टैक्स) विभाग द्वारा छापे के डर की वजह से बंद कर दिया गया था.

हवाला ऑपरेटर भी भागे-भागे फिरने लगे और सोचन लगे कि इस तरह की भारी नकदी के साथ क्या करना चाहिए. देश के कई राज्यों में इनकम टैक्स विभाग ने छापे मारे. आयकर विभाग ने दिल्ली के चांदनी चौक, मुंबई में तीन जगहों और चंडीगढ़ लुधियाना के साथ-साथ कई शहरों में अवैध तरीके से नोट बदलने और हवाला कारोबार के शक में छापे डाले. 18 नवम्बर को व्यवसाय चलाने के लिए पैसे नहीं होने का हवाला देते हुए मणिपुर में अखबारों ने अपने कार्यालय बंद कर दिए थे .

विपक्ष आज भी सरकार के कदम को बड़ा घोटाला मानती है किन्तु सरकार के लिए यह गर्व का दिन है .ध्यान रहे कि नोट बंदी के बाद सरकार के इस क़दम के शिकार होने वाले १०० से अधिक लोगों की जान चली गई थी.

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