तंज़ के बादशाह अकबर इलाहाबादी का आज जन्म दिन है

अकबर एक शानदार, तर्कशील, मिलनसार आदमी थे. और उनकी कविता हास्य की एक उल्लेखनीय भावना के साथ कविता की पहचान थी

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Written by
शाहिदुल इस्लाम
16 नवंबर 2019 @ 16:34

आजका इतिहास:

उर्दू के मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी का आज जन्म दिन है. इनको तंज का बादशाह भी कहा जता है. अकबर का असल नाम  सैयद अकबर हुसैन है. १८४६ में इलाहाबाद के निकट बारा में एक सम्मानजनक, परिवार में इन्हों ने जन्म लिया. उनके पिता का नाम सैयद तफ्फज़ुल हुसैन था. अकबर ने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने पिता द्वरा घर पे ही ग्रहन की. उन्होंने 15 साल की उम्र में अपने दो या तीन साल वरिष्ठ लड़की से शादी की थी और जल्द ही उन्की दूसरी शादी भी हुइ. दोंनो पत्नीयों से अकबर के २-२ पुत्र थे. अकबर ने वकालत की अध्ययन करने के बाद बतौर सरकारी कर्मचारी कार्य किया.

हालांकि अकबर एक अनिवार्य रूप से एक जीवंत, आशावादी कवि थे, उसके बाद के जीवन में चीजों के बारे में उनकी दृष्टि घर पर उसकी त्रासदी के अनुभव से घिर गई थी. उन्के बेटे और पोते का निधन कम उम्र में ही हो गया. यह उसके लिये बड़ा झटका था और निराशा का कारण बना. फलस्वरूप वह अपने जीवन के अंत की ओर काफी, वश में हो गया और तेजी से चिंताग्रस्त और धार्मिक होने लगे थे. व ७५ साल की उम्र में १९२१ में अकबर की मृत्यु हो गई.

अकबर एक शानदार, तर्कशील, मिलनसार आदमी थे. और उनकी कविता हास्य की एक उल्लेखनीय भावना के साथ कविता की पहचान थी. वो चाहे गजल, नजम, रुबाई या क़ित हो उनका अपना ही एक अलग अन्दाज़ था. वह एक समाज सुधारक थे और उनके सुधारवादी उत्साह बुद्धि और हास्य के माध्यम से काम किया था. शायद ही जीवन का कोई पहलू है जो उन्के व्यंग्य की निगाहों से बच गया था.

गोपेश मोहन जैसवाल लिखते है कि :अकबर इलाहाबादी उन्नीसवीं सदी की पुरातनपंथी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे. प्रगति के नाम पर सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक अथवा वैचारिक परिवर्तन उन्हें स्वीकार्य नहीं था. उनकी दृष्टि में रस्मो-रिवाज, तहज़ीब, मज़हबी तालीम, खवातीनों की खानादारी अर्थात स्त्रियों का कुशल गृह-संचालन, बड़ों का अदब आदि पौर्वात्य संस्कृति का अभिन्न अंग थे पर हमारे अग्रेज़ आक़ा हिन्दोस्तानियों की तरक्की के नाम पर इन सबको मिटाने पर और उनको मनसा, वाचा, कर्मणा काला अंग्रेज़ बनाने पर तुले हुए थे. अकबर इलाहाबादी ने जोशो-ख़रोश के साथ अपने अशआर के ज़रिये इसकी मुखालफ़त (विरोध) की थी .

इसमें कोई दो राय नहीं कि अकबर इलाहाबादी यह जानते थे कि उनके जैसे परम्परावादी कौम को आगे नहीं ले जा सकते लेकिन उन्हें इस बात का भी इल्म था कि मुल्क को तरक्की की राह पर ले जाने का दावा करने वाले खुद दिशा हीन थे

पुरानी रौशनी में, और नयी में, फ़र्क इतना है,
उन्हें कश्ती नहीं मिलती, इन्हें साहिल नहीं मिलता.

अकबर की शायेरी के इन नमूनों को देखिये :

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

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इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

...

आई होगी किसी को हिज्र में मौत

मुझ को तो नींद भी नहीं आती

...

हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना

हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

...

निया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं
बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं…

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ग कहते हैं बदलता है ज़माना सब को

मर्द वो हैं जो ज़माने को बदल देते हैं

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मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं

फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं

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पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा

लो आज हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए

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पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा

लो आज हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए

...

अकबर दबे नहीं किसी सुल्ताँ की फ़ौज से

लेकिन शहीद हो गए बीवी की नौज से

प्रस्तुति:शाहिदुल इस्लाम

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