इमॉटिकॉन्स के युग में... No Emoticons please!! - सुमन केशरी

इमॉटिकॉन्स या ईमोजीज़- यही तो कहते हैं उन रंग-बिरंगे चित्रांकनों को, जो हमारे मन में उठ रहे भावों को इन दिनों तुरंत-बिल्कुल सहज ढंग से प्रस्तुत कर देते हैं। हम खुश हैं तो वे हमारे लिए नाचते हैं और हम दुःखी हैं तो वे गोया हमारी आँखों के अक्स बन आँसू बहाते हैं... वे हमारे स्मार्ट फ़ोन पर मौजूद हैं, हमारे मैसेंजर बॉक्स में रहते हैं, वे हमारे सोशल मीडिया का ऐसे अंग बन गए हैं, कि अगर हम उनका उपयोग नहीं करते तो लगने लगता है कि अरे कैसे पुरातनपंथी हैं हम...एकदम पिछड़े हुए!

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13 जनवरी 2021 @ 12:13
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यह सब शुरु तो हुआ था- मोबाइल के उस काल में, जब मैसेज के लिए कैपिटल लेटर का उपयोग यह बताता था, कि मैसेज करने वाली आपसे नाराज है। वह आपको डांटना चाहती है। और आज इतने इमॉटिकॉन्स हैं- फूल से लेकर जानवर तक, छाती पिटते पुतले से लेकर मजाक उड़ाते हा हा तक और आँसू बहाते चेहरे तक! और रोज बरोज उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। आपके मन में जो भाव है, उसके अनुरूप इमॉटिकॉन चुनिए, पोस्ट कीजिए और आगे बढ़िए। आपने अपनी बात कह दी, पोस्ट पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। हो सकता है अगला ही पोस्ट विपरीत मनोभाव का हो, मानो अगर पिछला वाला मृत्यु पर संवेदना की मांग कर रहा है तो हो सकता है, बिल्कुल अगला वाला किसी के घर में नए मेहमान के आगमन की सूचना दे रहा हो...परेशान मत होइए, आपके लिए यहाँ भी कोई न कोई इमॉटिकॉन बाट जोह रहा है, सेलेक्ट कीजिए, पोस्ट कीजिए, आगे बढ़िए- समय बहुत कम है...आखिर फ़ेसबुक की दुनिया से बाहर निकल कर आपको नौकरी, व्यवसाय, अध्यापन, कला, रसोई, बाजार की दूसरी दुनिया में भी तो जाना है। वहाँ के काम इमॉटिकॉन से शायद न चलेंगे। वहाँ कुछ दूसरे ढंग की अभिव्यक्ति की दरकार है। भावनाओं की दुनिया से अलग है वह दुनिया। वह आभासी नहीं, बहुत ठोस और निर्मम है, शायद। इसीलिए सोचने की कहने की ऊर्जा उसके लिए बचाना जरूरी है। भावनाओं का क्या है, उन्हें हम आगे संभाल लेंगे।

मैंने इस लेख के पहले ही वाक्य में “सहज” का प्रयोग किया है, भावों की अभिव्यक्ति के संदर्भ में। किंतु कई बार आपको लगता ही होगा कि यह इमॉटिकॉन आपके भावों को उस रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहा जैसा कि आपके मन में उठ रहा है। तब कई बार आप मन मार कर किसी इमॉटिकॉन को पोस्ट कर देते हैं, कई बार साथ में कुछ लिख भी देते हैं। सॉफ्टवेयर कंपनियाँ आपके लिखे को गौर से पढ़ती हैं और तद्नुसार एक नया इमॉटिकॉन गढ़ती हैं। तभी तो हम पाते हैं कि दिनों-दिन ये विचित्र रेखांकन बढ़ते चले जा रहे हैं और हम-आप अपनी जरूरतों के हिसाब से उनका उपयोग करते चले जा रहे हैं। तो जो आपके लिए सहज है, वह इमॉटिकॉन के निर्माता के लिए चुनौती है। उसकी रचनात्मकता के लिए खूराक है।

लेकिन जरा गौर करें! इमॉटिकॉन का यह प्रयोग सहज है या सरल? अरे यह तो सरलता की तलाश है, जो भी काम आसानी से हो जाए तो अच्छा ही लगता है। आसानी-सरलता किसे बुरी लगेगी भला। मनुष्य का तो स्वभाव ही है कि वह कठिनता से आसानी की तरफ़ बढ़ना चाहता है, इसीलिए तो इतने आविष्कार व खोज हुए हैं। मनुष्य के विकास का रास्ता इसी सरलता की ओर ही तो बढ़ना है। और फिर भावों की भूल-भूल्लैया। उसे प्रकट करना और हूबहू प्रकट करना बला का दुष्कर काम है। कई बार तो बात कहने से भी बदल जाती है- “कहने में उनके सामने बात बदल बदल गई!” की मानिंद। तो ऐसे में ये इमॉटिकॉन वरदान की तरह लगते हैं, उसी तरह से जैसे आपने बचपन में कॉमिक्स पढ़े थे और आपको इस बात के लिए मगज़ नहीं खपाना पड़ा था कि यह डॉयलॉग किसका है। चरित्र के मुँह के पास से ही वह गुब्बारा हवा भरता था, जिसका वह डॉयलॉग हुआ करता था। और अब ये इमॉटिकॉन्स- कितने “हैंडी”- यानि कि सहज सुलभ हैं। आप मजे लेकर उन्हें देखिए और अपने काम के इमॉटिकॉन पर क्लिक कर दीजिए।

ऐसा करते ही, आप शब्दों के सागर से अपने मतलब की बूंदें छाँटने से बचे, उसे वाक्य में पिरोने और सही सही कह पाने की ज़द्दोज़हद से बचे। किंतु कभी आपने सोचा है कि ये इमॉटिकॉन्स या ईमोजीज़ आपको कितना दरिद्र कर रहे हैं। आप वे शब्द खोते जा रहे हैं, जो आपके मन में उभरा करते थे और आप उन्हें बहतरीन से बेहतरीन ढंग से कहने के लिए छटपटाते थे और सुनने के लिए प्यासे रहते थे। शब्द आपके अमूर्त भावों को मूर्तिमान कर देते थे। वे आपके अपने शब्द होते थे, आपके व्यक्तित्व और मन के सूचक। तभी तो पढ़ने-सुनने वाले के मन में वे बसे रह जाते थे। आज भी आप पुरानी बातों को याद करते हैं तो वे शब्द धीरे से आकर आपके मन में अपना होना जाहिर करते हैं। किसी खास व्यक्ति या पल को याद करते ही कही-सुनी गई बातों की ध्वनियाँ-अंतर्ध्वियाँ कानों में गूंजती हैं। वे पल साकार हो उठते हैं।

दरअसल कोई भी व्यवस्था डरती है तो भावनाओं के उभार से, प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों से। आप कहेंगे कि सत्ताएँ तो भावनाओं को उभार कर ही अपना हित-साधन करती हैं। यह सही है किंतु वे भावनाओं को भी सरलीकृत करती हैं- काले-सफेद के बाइनरी में।अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन के खाके में। वे उलझी-बहुआयामी भावनाओं को खत्म कर देना चाहती हैं, ताकि लोग स्याह-सफेद के सीमित दायरे में कैद हो जाएँ। शब्द स्याह-सफेद़ के परे होते हैं। एक खास पल में जिन अर्थों को वे प्रतिध्वनित करते हैं, हो सकता है किन्हीं अन्य पलों में उनका अर्थविस्तार हो जाए और वे उन बातों को रोशनी में ले आएँ, जो पहले प्रकाशित नहीं थीं। कभी-कभी तो शब्दों के तमाम अर्थ ही बदल जाते हैं। तब मनुष्य फिर से उनकी पुनर्स्थापना का प्रयास करता है। उनमें जान फूंकने का उद्यम किया करता है।

किंतु इमॉटिकॉन्स फैक्टरी से निकले मास प्रोडक्शन की तरह होते हैं। आपने देखा ही होगा कि आपके किसी एक पोस्ट पर अनेक लोग एक ही तरह के इमॉटिकॉन पोस्ट कर देते हैं। कोफ़्त होती है न? आपको हो न हो, मुझे तो बहुत होती है।आप कुछ पलों बाद इन्हें उतनी ही आसानी से भूल जाते हैं, जितनी आसानी से वे आपको मिले थे। किंतु ध्यान रखिए कि वस्तुतः यह न केवल आपकी भाषा से आपको अलग कर देने का प्रयास है, बल्कि आपकी कल्पना को भी खत्म करने की सोची समझी साजिश है।

इमॉटिकॉन्स का सरलीकरण इतना लुभावना है कि वह आपको सहज लगता है। सरल और सहज में फर्क है। सहज उतना आसान नहीं होता, जितना कि उसे मान लिया गया है। कोई भाषा सहज ही आपको सुलभ है, इसका मतलब यह नहीं कि आपने उसे आसानी से प्राप्त कर लिया, बल्कि यह है कि आपने इतनी मेहनत की उसे समझने-सीखने और बरतने की, कि अब वह आपके लिए हस्तामलकवत् हो गई है। यह कबीर वाला सहज है, जिसके लिए वे कहते हैं- सहज सहज सब कोई कहे सहज न चीन्है कोई। दरअसल सहज का अर्थ भावना-कल्पना और प्रश्न करने की क्षमता से वंचित होना नहीं है, बल्कि इन्हें सहज धारण करते हुए चलना है। इमॉटिकॉन्स की दुनिया हमें इसी मनुष्योचित स्वभाव से दूर कर रोबो में बदल देती है। वह हमें शब्दों से वंचित करके भावों के धरातल पर हमें दरिद्र करती है। हम कम से कमतर मनुष्य बनते चले जाने को अभिशप्त होते हैं।

आप यह देख ही रहे होंगे कि हमारा युवावर्ग दिनों दिन भाषा भूल रहा है। उनका वश चले तो वे टी क्यू माने थैंक्यू के शार्ट फ़ॉर्म की तरह ही अपने सारे काम शार्टकट में कर लें। हमारा युवागर्ग इमॉटिकॉन के युग में पला-बढ़ा वर्ग है। वह वही भाषा जानता है, जिससे उसे नौकरी मिलती है। वह भावनाओं के व्यापार को समय की बरबादी मानता है और अपनी दुनिया को ही समूची दुनिया। वह सोशल-मीडिया का बनाया मनुष्य है। क्या हम अप टू डेट बनने के चक्कर में अपनी भाषा और तर्कशीलता को त्याग देंगे या कोई उपाय सोचेंगे कि हम लौटकर उस आदिम युग में न पहुँच जाएँ जब हम गुफाओं में चित्राकंन करके अपनी बात कहते थे।

भाषा का आविष्कार मनुष्य की विकास की पहली सीढ़ी थी। आज हम उसी को छोड़ रहे हैं।

अगली बार जब आप किसी इमॉटिकॉन को अपने मन की बात कहने का माध्यम बनाएँ तो सोचें जरूर कि अगर आपने अपने भावों को, सोच को शब्द दिया होता तो वे क्या होते...कहीं आपके दिमाग की डिक्शनरी में शब्द कम तो नहीं हो रहे?

सोचिए जरूर !

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