गणतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति का आज जन्म दिन है

हिन्दू अधिनियम पारित करते समय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था, जिससे कहा जाता है कि उर्दू प्रेमियों को काफी तकलीफ भी हुई.

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Written by
शाहिदुल इस्लाम
2 दिसंबर 2019 @ 15:15

आजका इतिहास:

गणतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का आज जन्म दिन है. 03 दिसम्बर 1884 को आज के ही दिन राजेन्द्र बाबु का जीरादेई (सीवान) में जन्म हुआ था. वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे जिन्होंने आजादी से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में भी प्रमुख भूमिका निभाई थी. राजेन्द्र प्रसाद का भारतीय संविधान के निर्माण में भी योगदान था जिसकी परिणति 26 जनवरी 1950 को भारत के एक गणतंत्र के रूप में हुई थी. राष्ट्रपति बन्ने से पूर्व उन्होंने स्वाधीन भारत में केन्द्रीय मंत्ती के रूप में भी कुछ समय के लिए काम किया.

आम भारतीय के बीच राजेन्द्र बाबू बेहद लोकप्रिय रहे. इसी कारण लोग उन्हें श्रधा से राजेन्द्र बाबूकह कर पुकारना लोग पसंद करते था. यद्यपि राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू से शुरू हुई थी तथापि बी.ए. में उन्होंने हिंदी ही ली. वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी एवं बंगाली भाषा और साहित्य से पूरी तरह परिचित थे तथा इन भाषाओं में सरलता से प्रभावकारी व्याख्यान भी दे सकते थे.

गुजराती का व्यावहारिक ज्ञान भी उन्हें प्राप्त था. एम. एल. की परीक्षा के लिए हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रंथों से ही अध्ययन किया था. हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था. हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं जैसे भारत मित्र, भारतोदय, कमला आदि में उनके लेख भी छपते थे. उनके निबन्ध सुरुचिपूर्ण तथा प्रभावकारी होते. कहा जाता है कि 1912 में जब अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन कलकत्ते में हुआ तब स्वागतकारिणी समिति के वह चीफ बने. 1920 में जब अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का 10 वाँ अधिवेशन पटना में हुआ, तब भी वे इसकी कमान संभाल रहे थे. 1923 ई. में जब सम्मेलन का अधिवेशन कोकीनाडा में होने वाला था, तब वे उसके अध्यक्ष मनोनीत हुए थे परन्तु रुग्णता के कारण वे उसमें उपस्थित नहीं हो सके, किन्तु उनका भाषण जमनालाल बजाज ने पढ़ा था.

1926 में वे बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के और 1927 में उत्तर प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति के रूप में भी उनहोंने कार्यक्रम की शोभा बधाई थी. हिन्दी में उनकी आत्मकथा बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है. अंग्रेजी में भी उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका पदार्पण वक़ील के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करते ही हुआ था. चम्पारण में गांधीजी ने एक तथ्य अन्वेषण समूह भेजे जाते समय उनसे अपने स्वयंसेवकों के साथ आने का अनुरोध किया था. राजेन्द्र बाबू महात्मा गाँधी की निष्ठा, समर्पण एवं साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1921 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर का पदत्याग कर दिया.

गाँधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे, उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था. उन्होंने सर्चलाईट और देश जैसी पत्रिकाओं में इस विषय पर लेख भी लिखे थे और इन अखबारों के लिए अक्सर वे धन जुटाने का काम भी करते थे. 1914 में बिहार और बंगाल मे आई बाढ में उन्होंने काफी बढचढ कर सेवा-कार्य किया था. बिहार के 1934 के भूकंप के समय राजेन्द्र बाबू कारावास में थे. जेल से दो वर्ष रहने के बाद वे भूकम्प पीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन-मन से जुट गये और उन्होंने वायसराय के जुटाये धन से कहीं अधिक अपने व्यक्तिगत प्रयासों से जमा किया. सिंध और क्वेटा के भूकम्प के समय भी उन्होंने कई राहत-शिविरों का इंतजाम अपने हाथों मे लिया था. 1934 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गये.

नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने पुन: 1939 में सँभाला था. भारत के स्वतन्त्र होने के बाद संविधान लागू होने पर उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार सँभाला. राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांTग्रेस को दखलअंदाजी का मौका नहीं दिया और हमेशा स्वतन्त्र रूप से कार्य करते रहे. हिन्दू अधिनियम पारित करते समय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था, जिससे कहा जाता है कि उर्दू प्रेमियों को काफी तकलीफ भी हुई.

राष्ट्रपति के रूप में कुल मिला कर राजेन्द्र बाबू का कार्यकाल मिसाली रहा. संविधान लागू होने से एक दिन पहले 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया, लेकिन वे भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही दाह संस्कार में भाग लेने गये. 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की. अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया. 28 फरवरी 1963 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति का देहांत हो गया.

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