मुक़्तदा अल-सद्र  होसकते हैं इराक़ के प्रधानमंत्री !

इराक़ की राष्ट्रीय मीडिया के मुताबिक़ रविवार को हुए संसदीय चुनावों में शिया मुस्लिम धर्मिक नेता मुक़्तदा अल-सद्र की पार्टी जीत की ओर आगे बढ़ रही है

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12 अक्टूबर 2021 @ 16:50
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muqtada al sadr

बग़दाद: इराक़ की राष्ट्रीय मीडिया के मुताबिक़ रविवार को हुए संसदीय चुनावों में शिया मुस्लिम धर्मिक नेता मुक़्तदा अल-सद्र की पार्टी जीत की ओर आगे बढ़ रही है। वह देश के नए प्रधानमंत्री बनने की रेस में सबसे आगे हैं।
वोटों की गितनी के ये आंकड़े देश के चुनाव आयोग ने जारी किए हैं। इसके मुताबिक़ मुक़्तदा अल-सद्र की पार्टी 73 सीटों के साथ सबसे आगे है और दूसरे नंबर पर 38 सीटों के साथ मुहम्मद अल हलबोसी की पार्टी है। वहीं, 37 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर स्टेट ऑफ़ लॉ गठबंधन है। देश में कुल 329 संसदीय सीटें हैं। अब तक आए नतीज़ों के मुताबिक़ हदी अल-अमीरी के गठबंधन अल-फ़तह को बड़ा नुक़सान होता नज़र आ रहा है। इस गठबंधन को इस बार महज़ 14 सीटें मिली हैं। वहीं, साल 2018 के चुनाव में इसे 45 सीटें मिली थीं। बीबीसी अरबी के संवाददाता फ़िरास किलानी के मुताबिक़ अब तक के नतीजों से 'इराक़ की राजनीति में बड़ी हलचल नज़र आ रही है।' सभी बड़े गठबंधनों के वोट शेयर के प्रतिशत में भारी गिरावट दर्ज की गई है। 
ध्यान रहे कि ये चुनाव अगले साल होने थे लेकिन देश में बढ़ते प्रदर्शनों को देखते हुए इसे तय वक़्त से छह महीने पहले ही कराया गया। इन प्रदर्शनों में सैकड़ों लोग मारे गए। पुरानी चुनावी प्रणाली पार्टी के उम्मीदवारों की लिस्ट पर आधारित थी, लेकिन इस बार स्वतंत्र उम्मीदवारों को भी जगह दी गई। हालांकि मुख्य शिया ब्लॉक के खाते में ज्यादा सीटें जाती दिख रही हैं। साल 2003 में अमेरिकी हमले के बाद से ही मुख्य शिया ब्लॉक का दबदबा रहा है। इस हमले ने सद्दाम हुसैन के शासन को उखाड़ फेंका और सांप्रदायिक और जातीय पहचान पर आधारित सत्ता की साझेदारी की प्रणाली की शुरुआत की।
शुरुआती रूझान बताते हैं कि जो उम्मीदवार साल 2019 में सुधारों के पक्ष में किए गए प्रदर्शनों से उभर कर सामने आए, उन्हें जीत या बढ़त मिली है। मुक़्तदा अल-सद्र बेहद लोकप्रिय और सत्ता में दमखम रखने वाले धार्मिक नेता रहे हैं। अमेरिकी हमले के बाद उन्हें इराक़ की सत्ता में किंगमेकर माना जाता रहा है। वे ईरान और अमेरिका किसी की भी ओर से इराक़ में दखलंदाज़ी के ख़िलाफ़ रहे हैं। साल 2003 में उन्होंने अमेरिका के विरुद्ध हथियार उठाया था। साल 2019 में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और अराजकता के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों के बाद ये पहले आम चुनाव हैं। 

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