विमर्श

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कोरोना वायरस से हालात बिगड़ने के लिए जैसे ही सरकार की निंदा शुरू होती है, सारा दोष 'व्यवस्था' पर लाद दिया जाता है। लेकिन हमारे शासक चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा लें, इतिहास में उनका निकम्मापन दर्ज हो चुका है। देश की हालत को पूरी दुनिया अवाक होकर देख रही है।

कोविड-19 की दूसरी और कहीं अधिक खतरनाक लहर पूरे देश में छा चुकी है. जहाँ मरीज़ और उनके परिजन बिस्तरों, ऑक्सीजन और आवश्यक दवाओं की कमी से जूझ रहे हैं वहीं कोविड योद्धा इस कठिन समय में समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे. लोगों की भोजन और अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आईं हैं. इस महामारी ने एक ओर मानवता का चेहरा हमारे सामने लाया है वहीं हमारे शासकों के कई निर्णय काफी चौंकाने वाले हैं.

शुरुआत में डिनायल मोड होता है, जब धीरे-धीरे कोई भी बीमारी अपने पैर पसारती है। शुरुआत में लोगों को लगता है कि निपट लेंगे इससे भी, या हमें कुछ नहीं हो सकता।

अस्पताल और श्मशान में फ़र्क़ मिट गया है। दिल्ली और लखनऊ का फ़र्क़ मिट गया है।अहमदाबाद और मुंबई का फ़र्क मिट गया है। पटना और भोपाल का फ़र्क़ मिट गया है।

जिस समय बाबरी मस्जिद को ढ़हाने का भीषण अपराध किया जा रहा था उसी समय यह नारा भी लग रहा था "ये तो केवल झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है". बाबरी मस्जिद अभियान काफी लंबे समय तक चला था. इस दौरान रथयात्राएं निकलीं, खून-खराबा हुआ, एक समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत फैलाई गई और पूरे देश को धर्म के आधार पर बांट दिया गया.

देश में अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के खिलाफ जिस तरह की हिंसा हो रही है, वह हमारे संविधान में निहित समानता और बंधुत्व के मूल्यों के लिए खतरा है। आज बहुवाद और कमजोर वर्गों के लिए सकारात्मक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

शचीरानी गुर्टू ने जैनेंद्र से एक साक्षात्कार में पूछा था कि अगर महादेवी माँ और गृहिणी होती तो ? जैनेंद्र भी जवाब में कहते हैं कि तब उनकी कविता इतनी सूक्ष्म, गूढ या जटिल न होती, प्रकृत होती। सहज होती।