विमर्श

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'कोंस्टीट्युशनल एंड लीगल चैलेंजेज फेस्ड बाई रिलीजियस माइनॉरिटीज इन इंडिया' शीर्षक से जारी रपट के अनुसार भारत में दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव है और उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। उनके खिलाफ नफरत-जनित अपराधों में 2014 के बाद से तेजी से वृद्धि हुई है।

मुसलमानों के बीच हाल तक उनके समर्थक भारी मात्रा में मौजूद रहे क्योंकि कुल मिलाकर उनकी राजनीति मोटामाटी सेक्युलर ही थी. मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद से उनकी पार्टी का ग्राफ बुरी तरह नीचे गिरा और गिरता ही गया जो अब पंचायत चुनाव में थोड़ा संभलता दिखा.

मुस्लिम शासकों और सिख गुरुओं के बीच टकराव, सत्ता संघर्ष का हिस्सा था और इसे इस्लाम और सिक्ख धर्म के बीच टकराव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। नानक के बाद के गुरुओं से अकबर के बेहद मधुर संबंध रहे।

यह सवाल स्टंट का नहीं है। जब सैंकड़ों हज़ारों लोग आक्सीजन की कमी की वजह से तड़प कर मर गए तब यह सवाल केवल स्टंट का नहीं होना चाहिए। कुछ चैनलों ने फैसला किया है कि वे चुनावी नतीजों को कवर नहीं करेंगे। हमें देखना चाहिए कि क्या ये चैनल जो चुनावी नतीजों को कवर नहीं करेंगे, कोविड की नाकामी को लेकर सरकार से सवाल करेंगे? चुनावी नतीजों को कवर न करने के जिस नैतिक बल का प्रदर्शन कर रहे हैं क्या वे उस नैतिक बल से उस सरकार को घेरेंगे जिसके झूठ को लोगों तक पहुंचाते रहे?

कोरोना वायरस से हालात बिगड़ने के लिए जैसे ही सरकार की निंदा शुरू होती है, सारा दोष 'व्यवस्था' पर लाद दिया जाता है। लेकिन हमारे शासक चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा लें, इतिहास में उनका निकम्मापन दर्ज हो चुका है। देश की हालत को पूरी दुनिया अवाक होकर देख रही है।

कोविड-19 की दूसरी और कहीं अधिक खतरनाक लहर पूरे देश में छा चुकी है. जहाँ मरीज़ और उनके परिजन बिस्तरों, ऑक्सीजन और आवश्यक दवाओं की कमी से जूझ रहे हैं वहीं कोविड योद्धा इस कठिन समय में समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे. लोगों की भोजन और अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आईं हैं. इस महामारी ने एक ओर मानवता का चेहरा हमारे सामने लाया है वहीं हमारे शासकों के कई निर्णय काफी चौंकाने वाले हैं.

शुरुआत में डिनायल मोड होता है, जब धीरे-धीरे कोई भी बीमारी अपने पैर पसारती है। शुरुआत में लोगों को लगता है कि निपट लेंगे इससे भी, या हमें कुछ नहीं हो सकता।