गुजरात के सजायाफ्ता आई पी एस अफसर संजीव भट्ट याद हैं न

गुजरात दंगे में तत्कालीन मुख्यमंत्री और आज देश के प्रधानमंत्री के लिप्त होने का आरोप लगा कर चर्चा में आये श्री भट्ट का एक फोटो कोई एक साल बाद सामने आया.

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7 अक्टूबर 2019 @ 16:30
Sanjeev Bhatt

गुजरात के सजायाफ्ता आई पी एस अफसर संजीव भट्ट याद हैं न ? गुजरात दंगे में तत्कालीन मुख्यमंत्री और आज देश के प्रधानमंत्री के लिप्त होने का आरोप लगा कर चर्चा में आये श्री भट्ट का एक फोटो कोई एक साल बाद सामने आया. उन्होंने 14 अप्रैल 2011 को सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर आरोप लगाया था, 'मोदी ने 27 फ़रवरी 2002 को एक बैठक में पुलिस के शीर्ष अधिकारियों से कहा कि वे मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंदुओं को अपना ग़ुस्सा बाहर निकालने दें।'
उन्हें सन नब्बे के एक मामले में हिरासत में मौत का दोषी बता कर आजीवन कारावास की सजा हो चुकी हैं वे किसी अन्य मुक़द्में में भी मुजरिम हैं और जूना गढ़ की अदालत में आये, लम्बे समय से अपने पति की रिहाई के लिए संघर्ष कर रहीं उनकी पत्नी स्वेता भट्ट खुद पर काबू नहीं कर पायीं और फूट-फूट कर रो दीं. शायद भारतीय न्याय व्यवस्था में यह ऐसा विरला मामला है जिसे कोई एपेक्स कोर्ट सुनने को भी तैयार नहीं . उनके घर का एक हिस्सा अमदाबाद नगर निगम ने गिरा दिया और इस मामले में भी कोर्ट ने दखल से मना किया
भट्ट का मामला नवंबर 1990 का है, जब उन्होंने जामजोधपुर शहर में दंगे भड़काने के लिए कई लोगों (विभिन्न रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या 110 से 150 के बीच थी) को भारत बंद के दिन हिरासत में लिया था, यह वही दिन था जब भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ख़त्म हुई थी.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट उस समय जामनगर जिले के एडिशनल एसपी थे, जिन्हें तत्कालीन एसपी टीएस बिष्ट द्वारा जामजोधपुर भेजा गया था.

जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था उनमें एक प्रभुनाथ वैष्णानी भी थे, जिन्हें हिरासत में लिए जाने के नौ दिन बाद जमानत पर रिहा गया था और कथित तौर पर रिहा होने के 10 दिन बाद उनकी मौत हो गई थी, जब उनका एक अस्पताल में इलाज चल रहा था.

उनके भाई अमृतलाल ने भट्ट समेत आठ पुलिसकर्मियों पर हिरासत में प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज करवाई थी. इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए अमृतलाल ने बताया था कि प्रभुदास एक किसान थे और दंगों के जिम्मेदार नहीं थे.

मजिस्ट्रेट ने इस मामले का संज्ञान 1995 में लिया था, लेकिन इस मामले की सुनवाई पर गुजरात हाईकोर्ट द्वारा 2011 तक स्टे लगा दिया गया था.

बीते12 जून को सुप्रीम कोर्ट ने भट्ट की 11 अतिरिक्त गवाहों को पेश करने की याचिका ठुकरा दी थी.

भट्ट इस दावे के साथ शीर्ष अदालत में पहुंचे थे कि अभियोजन द्वारा मामले के 300 गवाहों की सूची बनायी गयी थी, लेकिन असल में पूछताछ केवल 32 से हुई है. उनका यह भी दावा था कि कई महत्वपूर्ण गवाहों, जिनमें इस मामले की जांच करने वाले तीन पुलिसकर्मी भी शामिल हैं, से पूछताछ नहीं हुई.

ये लेखक से निजी विचार हैं पल पल न्यूज से इसका कोई लेना देना नही है। 

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