विमर्श

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सूक्ष्म और सॉफ्ट रूप से सियासत की एक और धारा चलती है, जिसे अध्यात्मिक धारा कहते हैं. अध्यात्मिक धारा को निजी तौर पर मैं साजिश नहीं मान पाता. इसका प्रस्थान बिंदु दुःख मुक्ति के भाव में हैं और ये धारा मनुष्यों के बीच किसी तरह का भेदभाव भी नहीं करती. हलांकि ये परम्परा निर्दोष दिखाई देती है, लेकिन इसका दोष इससे सम्बंधित व्यक्तियों में नहीं बल्कि इसकी प्रक्रिया में है.

सम्प्रदायिक, जातीय या नस्लीय सियासत को तब राजसत्ता, धर्म सत्ता और पूँजीसत्ता का भरपूर समर्थन मिलता है जब राजसत्ता आम जनता के बजाये पूंजीपतियों पर देश के पैसे लुटाने के लिए विवश होती है.

राजसत्ता जब जतना की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में नाकाम होती है तो आम लोगों को भावनात्मक मुद्दों पर तरह तरह से उलझाती है. भारत में हिंदुत्व की राजनीति अपने जन्म से लेकर आज तक यही करती रही है. चूंकि ये धर्म, राष्ट्र, देशप्रेम, सेना का सम्मान आदि पर हमेशा बात करते हैं, इसलिए लगता है कि इनके लिए देश, धर्म, राष्ट्र ही सर्वोपरि है. ये बातें जनता को भी अपील करती हैं. इन भावनात्मक मुद्दों का जादू देखिये

भाजपा जैसी पार्टी की सियासत से मुसलमान को निकाल दीजिये तो इनके पास करने के लिए कुछ नहीं बचता. यानि मुसलमान विरोधी साम्प्रदायिकता पूंजीपतियों और भाजपा के अलावा सभी के लिए नुकसान देने वाली सियासत है

धार्मिक जुलूस में आपको उलछते-कूदते देख अच्छा लग रहा है। जिस हिन्दी भाषी समाज ने आप हिन्दी मिडियम वालों को किनारे सरका दिया था, उस समाज की मुख्यधारा में आप लौट आए हैं।क्या शानदार वापसी की है

मुसलमानों के प्रति अभी जो हिंसा हो रही है, इसमें कई बातें नई हैं. अभी तक जब मुसलमानों, दलितों या आदिवासियों के प्रति हिंसा होती थी तब भी सरकार और प्रशासन में बैठे लोगों पर हिंसा करने वालों का साथ देने का इलज़ाम लगता था, लेकिन सरकार और प्रशासन की ये पूरी कोशिश होती थी कि लोग उन पर भरोसा करें.

हिन्दुस्तान अखबार के लखनऊ संस्करण के छायाकार सुधांशु की जांबाज़ी ने साबित कर दिया