कौन है ये लड़की, जिसका नाम आज हर तरफ गूंज रहा है? मिलिए हरियाणा की नीरू ढांडा से, जिसने Asian Games में जीते 3 मेडल

अगर पिछले कुछ दिनों से ‘नीरू ढांडा’ नाम बार-बार सुनाई दे रहा है, तो सवाल उठता है-आखिर कौन है ये लड़की, जिसने एशियन गेम्स में ऐसा इतिहास रच दिया? जवाब है हरियाणा के जींद जिले के संगतपुरा गांव से निकली एक ऐसी बेटी, जिसने बेहद साधारण हालात से निकलकर भारतीय सेना में नायब सूबेदार बनने तक का सफर तय किया और अब एशियन गेम्स में तीन पदक अपने नाम कर चुकी हैं।

नीरू ने महिला व्यक्तिगत ट्रैप शूटिंग में 28/30 के स्कोर के साथ स्वर्ण पदक जीतकर नया एशियाई रिकॉर्ड बनाया और इस स्पर्धा में व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। इसके बाद उन्होंने कीनन चेनाई के साथ मिक्स्ड टीम ट्रैप में दूसरा स्वर्ण जीता, जबकि मनीषा कीर और आशिमा अहलावत के साथ महिला टीम ट्रैप में रजत पदक अपने नाम किया।

लेकिन नीरू की असली कहानी इन तीन पदकों से कहीं आगे जाती है। हरियाणा के एक BPL परिवार से आने वाली नीरू के लिए शूटिंग की शुरुआत महंगे उपकरणों और बड़ी सुविधाओं के साथ नहीं हुई थी। परिवार में मौजूद पुरानी डबल-बैरल बंदूक से टीन के डिब्बों पर निशाना लगाते हुए उन्होंने अपने सफर की शुरुआत की। उन्हें शूटिंग के लिए प्रेरणा अपने मौसेरे भाई लक्ष्य श्योराण से मिली, जिन्होंने 2018 एशियन गेम्स में रजत पदक जीता था। बाद में मुफ्त प्रशिक्षण और सुविधाओं की जानकारी मिलने पर वह मध्य प्रदेश पहुंचीं और आगे चलकर भारतीय सेना की Corps of Military Police में शामिल हुईं।

आज वह Army Marksmanship Unit, Mhow में प्रशिक्षण लेती हैं।
नीरू की हालिया उपलब्धियों की कहानी भी कम खास नहीं है। जुलाई 2026 में इटली के लोनाटो ISSF Shotgun World Cup में उन्होंने महिला ट्रैप का स्वर्ण जीतकर इस स्पर्धा में व्यक्तिगत वर्ल्ड कप गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनने का रिकॉर्ड बनाया था। 2025 Asian Shooting Championships में भी उन्होंने व्यक्तिगत और टीम स्पर्धाओं में स्वर्ण जीता था।

और शायद सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि एशियन गेम्स से करीब 10 दिन पहले नीरू H1N1 संक्रमण के कारण दिल्ली के अस्पताल में भर्ती थीं। वह कई हफ्तों की ट्रेनिंग से दूर रहीं, जापान देर से पहुंचीं और बारिश के बीच उन्हें प्रतियोगिता से पहले सिर्फ सीमित अभ्यास का मौका मिला। इसके बावजूद उन्होंने फाइनल में एशियाई रिकॉर्ड बना दिया।

नीरू की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की जीत नहीं है। यह उस लड़की की कहानी है जिसने सीमित संसाधनों से शुरुआत की, सेना की वर्दी पहनी और अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन कर रही है। उनकी सादगी भी उतनी ही खास है-वह कहती हैं कि उन्होंने शूटिंग के दौरान खुद को सहज रखने की कोशिश इसलिए की, ताकि देश की छोटी बच्चियां और युवा खिलाड़ी इस खेल से डरें नहीं और सोचें, “अगर नीरू कर सकती है, तो हम भी कर सकते हैं।”

शायद यही वजह है कि नीरू ढांडा के तीन पदक सिर्फ मेडल नहीं हैं उन हजारों बेटियों के लिए एक संदेश हैं, जिन्हें अपने सपनों तक पहुंचने के लिए शुरुआत छोटे साधनों से करनी पड़ती है।

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