रेप आज के भारत में एक अपराध नहीं, बल्कि एक बदनुमा धब्बा है, जिसे सरकारें मिटाने की जगह उसे ढकने में लगी हैं। महिलाएँ इंसाफ मांग रही हैं, लेकिन हमारे नेता अपनी वोट बैंक की राजनीति से बाहर नहीं आना चाहते। क्या यही है ‘नए भारत’ का सपना, जहाँ महिलाओं की चीखें सत्ता के गलियारों में गुम हो जाती हैं?
निर्भया की दरिंदगी के बाद जो सुधारों की आस जगी थी, वह अब एक बेकार की उम्मीद लगती है। हाल ही में कलकत्ता में एक डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार ने यह साबित कर दिया है कि हमारे न्याय और कानून के आश्वासन कितने खोखले हैं।
निर्भया केस ने एक नए युग की शुरुआत की बात की थी। हजारों लोग सड़कों पर उतरे, मीडिया ने बहस की, और सरकार ने सख्त कानून बनाने की घोषणाएं कीं। लेकिन हकीकत में, क्या स्थिति में कोई सुधार आया है? न तो रेप की घटनाओं में कमी आई है और न ही न्याय प्रणाली में सुधार हुआ है। कलकत्ता के डॉक्टर केस ने यह साफ कर दिया है कि हमारे कानून केवल कागज पर ही मजबूत हैं।
हर साल हजारों रेप केस दर्ज होते हैं, लेकिन इनमें से 99 प्रतिशत केस न्याय के कियॉस्क तक भी नहीं पहुंचते। यही स्थिति निर्भया के केस में भी थी। अपराधी पर सख्त सजा का वादा किया गया था, लेकिन वास्तव में क्या हुआ? दोषियों को सजा देने में वर्षों लग गए, और फिर भी पीड़िता को न्याय नहीं मिला।
कलकत्ता केस में, जहां एक डॉक्टर को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक हिंसा का शिकार बनाया गया, यह स्पष्ट हो गया है कि हमारी न्याय प्रणाली कितनी लचर है। आरोपियों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलाने में क्या फर्क पड़ा है? कुछ भी नहीं। हमारे कानून, जो बलात्कारियों को कड़ी सजा देने का वादा करते हैं, असल में उन्हें खुली छूट देते हैं।
महिलाएँ आज भी न्याय के लिए संघर्ष कर रही हैं। महिलाओं की सुरक्षा केवल एक बेतुकी बात है। हमारी सरकारें और कानून केवल दिखावा कर रहे हैं, वास्तविकता में वे महिलाओं की समस्याओं को हल करने में पूरी तरह विफल हैं।
महिलाएँ क्या चाहती हैं? सबसे पहले, वे चाहती हैं कि उन्हें इंसान समझा जाए। लेकिन क्या सरकारें और प्रशासन इसे समझना चाहते हैं? शायद नहीं। जब हर दिन 86 महिलाएँ रेप का शिकार होती हैं और अपराधियों में से अधिकतर उनके परिचित होते हैं, तो यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारे समाज का एक घिनौना चेहरा है। लेकिन क्या यह किसी को झकझोरता है? नहीं। यह देश, जो अपनी संस्कृति और सभ्यता पर गर्व करता है, जब महिलाओं की बात आती है, तो यही सभ्यता गूंगी-बहरी हो जाती है।
31,677 रेप केस 2021 में दर्ज हुए, लेकिन क्या इससे भी अधिक शर्मनाक यह नहीं है कि इनमें से अधिकांश मामलों में दोषी खुलेआम घूम रहे हैं? केवल 39.3% मामलों में सजा मिली, और वो भी तब, जब पीड़िताओं ने वर्षों तक अदालतों में चक्कर काटे। यह न्याय की प्रक्रिया नहीं, बल्कि पीड़िता के साथ एक और रेप है—इस बार व्यवस्था द्वारा।
महिलाएँ सख्त सजा चाहती हैं, त्वरित न्याय चाहती हैं। लेकिन हमारे नेता और न्यायपालिका क्या करते हैं? एक-दूसरे पर उंगली उठाते हैं, बयानबाज़ी करते हैं, और फिर सब भूल जाते हैं। अदालतों में 1.7 लाख से अधिक रेप के मामले लंबित हैं, और सरकारें केवल वादे कर रही हैं। यह सिस्टम महिलाओं को क्या संदेश दे रहा है? यही कि अगर आप पीड़िता बन जाएं, तो आपको इंसाफ के लिए लंबा इंतजार करना होगा—शायद इतना लंबा कि आपकी चीखें ही दम तोड़ दें।
राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, और महाराष्ट्र में सबसे अधिक रेप के मामले दर्ज होते हैं। लेकिन इन राज्यों की सरकारें क्या कर रही हैं? शायद कुछ भी नहीं। ये सरकारें महिलाओं की सुरक्षा पर भाषण देती हैं, लेकिन जब असल में कुछ करने की बात आती है, तो सब चुप हो जाते हैं। यही है असली हिंदुस्तान, जहाँ महिलाओं की सुरक्षा पर राजनीति हो रही है, और उनकी सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है।
महिलाएँ इंसाफ चाहती हैं, लेकिन क्या यह देश उन्हें दे सकता है? शायद नहीं। जब तक हमारी सरकारें, न्यायपालिका, और समाज इस गंभीर मुद्दे को केवल एक और समस्या की तरह देखता रहेगा, तब तक यह देश महिलाओं के लिए एक सुरक्षित स्थान नहीं बन सकता। और अगर हमने जल्द ही कुछ नहीं किया, तो यह तमाशा चलता रहेगा, और महिलाएँ इसी तरह न्याय के लिए चीखती रहेंगी।
