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2020 दिल्ली दंगा: बब्बू हत्या केस में 11 मुस्लिम बरी, 8 गैर-मुस्लिमों पर हत्या के आरोप तय | Pal Pal News

🗓️ नई दिल्ली | 21 मार्च 2025 | Pal Pal News

दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने 2020 के दंगों में ऑटो-रिक्शा चालक बब्बू की हत्या के मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए 11 मुस्लिम आरोपियों को ससम्मान रिहा कर दिया है। वहीं, 8 गैर-मुस्लिम आरोपियों पर हत्या, उपद्रव और सांप्रदायिक नफरत फैलाने के आरोप तय किए गए हैं।

यह मामला एफआईआर नंबर 119/2020 के तहत खजूरी खास पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुलस्त्य प्रमाचला ने 18 मार्च को दिए अपने फैसले में कहा कि मुस्लिम समुदाय से जुड़े आरोपियों के खिलाफ कोई भी ठोस सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि वे बब्बू की हत्या में शामिल थे।


वीडियो फुटेज में सच्चाई सामने आई

अदालत ने वीडियो साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए साफ किया कि बब्बू को हमलावर भीड़ मार रही थी, जबकि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग उसे बचाने की कोशिश कर रहे थे। यह भी कहा गया कि बब्बू स्वयं मुस्लिम था, फिर भी इस मामले में समुदाय विशेष को टारगेट किया गया, जो न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।


जमीअत उलमा-ए-हिंद ने निभाई अहम भूमिका

इन 11 बरी हुए मुस्लिम युवकों की पैरवी जमीअत उलमा-ए-हिंद की ओर से की गई। संस्था के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी के निर्देश पर एडवोकेट अब्दुल गफ्फार ने कानूनी सहायता दी। रिहा किए गए लोगों में शामिल हैं:

  • मारूफ पुत्र कल्लू, निवासी श्रीराम कॉलोनी, खजूरी खास
  • शहाबुद्दीन पुत्र मोहम्मद अनवर, निवासी खजूरी खास
  • इमरान पुत्र इस्लामुद्दीन, निवासी श्रीराम कॉलोनी, खजूरी खास
  • इकबाल पुत्र वसीम, और अन्य निर्दोष नागरिक

अदालत ने क्या कहा?

अदालत ने विशेष रूप से इन बिंदुओं पर प्रकाश डाला:

  • अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि मुस्लिम आरोपी उस हिंसक भीड़ का हिस्सा थे।
  • वीडियो फुटेज में मुस्लिम समुदाय के लोग पीड़ित बब्बू को बचाते नज़र आए।
  • हत्या के लिए जिम्मेदार गैर-मुस्लिम आरोपियों पर अब IPC की धारा 148, 153A, 302, और 149 के तहत केस चलेगा।

📺 इस खबर से जुड़ी पूरी वीडियो रिपोर्ट यहां देखें:

▶️ Pal Pal News की वीडियो रिपोर्ट देखें


निष्कर्ष

इस फैसले ने एक बार फिर यह साबित किया कि न्याय प्रक्रिया में सच्चाई और सबूतों का महत्व सर्वोपरि है। साथ ही यह घटना बताती है कि दंगों जैसे संवेदनशील मामलों में पुलिस और जांच एजेंसियों को निष्पक्षता के साथ काम करने की ज़रूरत है। निर्दोषों को जेल में डालना न सिर्फ अन्याय है बल्कि समाज में विभाजन भी पैदा करता है।

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