प्रयागराज: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के घरों पर बुलडोज़र चलाने की कार्रवाई पर कड़ी नाराज़गी जताई है। अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि क्या इन कार्रवाइयों में कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था? साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के किसी का भी मकान गिराना “इंसाफ नहीं, इन्तक़ाम” माना जाएगा।
मामला क्या है?
प्रयागराज में कुछ दिन पहले नूपुर शर्मा के विवादित बयान के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद झड़पें हुई थीं। इसके बाद पुलिस ने जिन लोगों को उपद्रव का दोषी ठहराया, उनमें से अधिकतर मुस्लिम समुदाय के थे। इन लोगों के घरों पर बुलडोज़र चला दिया गया, जिनमें कई मकान ऐसे भी थे जो सालों से वहाँ मौजूद थे और वैध दस्तावेज़ों के साथ बने थे।
याचिका और कोर्ट की टिप्पणी
‘Youth for Human Rights‘ नामक संगठन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई, जिसमें कहा गया कि यह कार्रवाई धार्मिक भेदभाव के आधार पर की गई है और इसका मकसद सज़ा देना नहीं बल्कि बदला लेना है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा:
“अगर कोई गुनहगार है, तो उसके खिलाफ क़ानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन क़ानून की अनदेखी करके किसी का घर गिराना संविधान के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है।”
सरकार की सफाई और अदालत की सख़्ती
राज्य सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि जिन घरों को तोड़ा गया, वे अवैध निर्माण थे।
लेकिन अदालत ने पूछा:
“क्या सभी अवैध निर्माण मुसलमानों के इलाकों में ही हैं? क्या इन कार्रवाइयों से पहले कानूनी नोटिस जारी किया गया था?”
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पिछली सभी बुलडोज़र कार्रवाइयों की रिपोर्ट पेश करने को कहा है और कहा है कि वो इन मामलों की न्यायिक जांच करेगा। यदि कहीं भी कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी या पक्षपात पाया गया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न सिर्फ़ उत्तर प्रदेश सरकार के लिए एक चेतावनी है, बल्कि एक उम्मीद भी है उन हज़ारों लोगों के लिए जो बुलडोज़र राजनीति का शिकार हुए हैं।
यह फैसला बताता है कि भारत का संविधान अभी भी ज़िंदा है, और अदालतें किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं — चाहे वो किसी भी धर्म या वर्ग से क्यों न हो।
