ईरान ने आधिकारिक रूप से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिवंगत सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के राज्यीय अंतिम संस्कार में शामिल होने का निमंत्रण भेजा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। यह औपचारिक आमंत्रण ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की ओर से नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास के माध्यम से भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) को सौंपा गया है। प्रस्तावित कार्यक्रम 4 जुलाई से 9 जुलाई 2026 के बीच ईरान के विभिन्न शहरों में आयोजित किया जाएगा, जिसमें तेहरान, क़ोम, नजफ, करबला और मशहद शामिल हैं।जानकारी के अनुसार, 4 और 5 जुलाई को तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला कॉम्प्लेक्स में खामेनेई के पार्थिव शरीर को जनता के दर्शन के लिए रखा जाएगा, जबकि 6 जुलाई को मुख्य राज्यीय अंतिम संस्कार समारोह आयोजित होगा।
इसके बाद 7 जुलाई को क़ोम में धार्मिक नेताओं की विशेष श्रद्धांजलि सभा होगी। 8 जुलाई को इराक के पवित्र शहरों नजफ और करबला में भी विशेष प्रार्थनाएं आयोजित की जाएंगी, और 9 जुलाई को मशहद स्थित इमाम रज़ा दरगाह में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। अनुमान है कि इस पूरे आयोजन में लगभग 2 करोड़ लोगों की भागीदारी हो सकती है।
यह आमंत्रण ऐसे समय में आया है जब वैश्विक राजनीति पहले से ही संवेदनशील दौर से गुजर रही है। खामेनेई का निधन फरवरी 2026 में एक सैन्य संघर्ष के दौरान हुआ था, जिसमें अमेरिका और इजराइल की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बना रहा। इसी कारण यह अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक या औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-राजनीतिक मंच भी माना जा रहा है।भारत के लिए यह स्थिति एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संतुलन का विषय बन गई है।
एक ओर ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं, जिनमें चाबहार पोर्ट परियोजना और ऊर्जा सहयोग प्रमुख हैं। दूसरी ओर भारत के अमेरिका और इजराइल जैसे देशों के साथ भी मजबूत रणनीतिक साझेदारी है।
ऐसे में किसी भी उच्च स्तरीय भागीदारी का निर्णय वैश्विक संकेतों के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी स्वयं इस यात्रा पर न जाएं, बल्कि भारत की ओर से कोई वरिष्ठ मंत्री या उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजा जा सकता है, जैसा कि पहले भी ऐसे अवसरों पर किया गया है। उदाहरण के तौर पर, ईरान के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के निधन के समय भी भारत ने उच्च स्तरीय प्रतिनिधि भेजकर संतुलित रुख अपनाया था।
फिलहाल विदेश मंत्रालय ने इस पर कोई अंतिम निर्णय घोषित नहीं किया है। भारत की नीति हमेशा से संतुलन और रणनीतिक साझेदारी के बीच सामंजस्य बनाए रखने की रही है, और इस मामले में भी उसी दिशा में कदम उठाए जाने की संभावना है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि भारत इस संवेदनशील कूटनीतिक निमंत्रण पर क्या रुख अपनाता है।
