ईरान और अमेरिका के बीच हालिया युद्धविराम (Ceasefire) और शांति समझौते के पीछे एक बेहद जटिल और लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया रही है, जिसे अचानक हुआ फैसला नहीं बल्कि महीनों की गुप्त बातचीत, अंतरराष्ट्रीय दबाव और क्षेत्रीय संकटों का परिणाम माना जा रहा है।
घटनाक्रम की शुरुआत 28 फरवरी 2026 से मानी जाती है, जब अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए एक बड़े हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई, जिसके बाद पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थिति बन गई और ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट खड़ा हो गया।
इसी दबाव के बीच अप्रैल 2026 में पाकिस्तान की मध्यस्थता से पहला अस्थायी युद्धविराम प्रस्ताव सामने आया, जिसमें 45 दिनों की शांति योजना रखी गई, लेकिन शुरुआती असहमति के बाद केवल 2 हफ्ते का सीमित संघर्षविराम लागू हो सका, जो जमीन पर पूरी तरह प्रभावी नहीं रहा और तनाव लगातार बना रहा।
इसके बाद अमेरिका द्वारा नौसैनिक नाकाबंदी जैसे कदम उठाए जाने से स्थिति और बिगड़ गई, जिसके चलते कतर, सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के साथ पाकिस्तान ने मिलकर एक व्यापक शांति समझौते की दिशा में प्रयास तेज किए। 12 जून 2026 को ‘इस्लामाबाद समझौता’ के रूप में 14-सूत्रीय ड्राफ्ट पर सहमति बनी, और 14 जून को डिजिटल हस्ताक्षर के बाद 17 जून 2026 को इसे औपचारिक रूप दिया गया, जिसमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने अलग-अलग स्थानों से इस पर हस्ताक्षर किए।
इस समझौते के तहत तत्काल युद्धविराम, सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों की रोक, होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खोलना, ईरान के यूरेनियम भंडार को IAEA की निगरानी में नियंत्रित करना और अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों में आंशिक राहत देने जैसे अहम प्रावधान शामिल किए गए हैं, साथ ही 60 दिनों के भीतर एक स्थायी शांति ढांचे पर बातचीत का रोडमैप तय किया गया है।
ईरान इसे अपनी कूटनीतिक जीत और अमेरिका की रणनीतिक असफलता के रूप में पेश कर रहा है, जबकि अमेरिका का कहना है कि यह केवल एक शुरुआती समझौता है और भविष्य की शर्तों पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाई का रुख क्या होगा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह समझौता शांति की दिशा में कदम होने के बावजूद अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं है और क्षेत्रीय राजनीति में इसका प्रभाव आने वाले समय में और गहरा हो सकता है।
