70 मिनट, 21 धमाके और 56 मौतें: अहमदाबाद ब्लास्ट केस में 18 साल बाद आया अंतिम फैसला

26 जुलाई 2008 को गुजरात का अहमदाबाद शहर एक ऐसी आतंकी घटना से दहल उठा, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। महज 70 मिनट के भीतर शहर के अलग-अलग हिस्सों में 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए, जिनमें 56 लोगों की मौत हो गई और 240 से ज्यादा लोग घायल हुए। करीब 18 साल लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त सजा कायम रखी।

आतंकियों ने इस हमले को बेहद सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया था। भीड़भाड़ वाले इलाकों में साइकिलों और अन्य जगहों पर बम लगाए गए थे। शुरुआती धमाकों के बाद जब घायल लोग इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे, तब ट्रॉमा सेंटरों के बाहर भी धमाके किए गए। जांच एजेंसियों के अनुसार, इसका उद्देश्य घायलों, उनके परिजनों और अस्पताल कर्मियों को निशाना बनाना था।

धमाकों के कुछ दिन बाद सूरत में भी बड़ी संख्या में जिंदा बम बरामद किए गए, जिन्हें समय रहते निष्क्रिय कर दिया गया। जांच में सामने आया कि इस साजिश के पीछे इंडियन मुजाहिदीन और प्रतिबंधित संगठन SIMI से जुड़े लोग शामिल थे। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह हमला गुजरात दंगों के बदले की भावना से जुड़ी साजिश का हिस्सा था।इस मामले की जांच बेहद व्यापक रही।

कई एफआईआर को जोड़ा गया, 1,100 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए और वर्षों तक सुनवाई चली।फरवरी 2022 में अहमदाबाद की विशेष अदालत ने 49 आरोपियों को दोषी ठहराया था। अदालत ने 38 दोषियों को मौत की सजा और 11 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

यह स्वतंत्र भारत में एक ही मामले में दी गई सबसे बड़ी सामूहिक मौत की सजा में से एक थी।अब जुलाई 2026 में गुजरात हाई कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा है।

कोर्ट ने 38 दोषियों की फांसी और 11 दोषियों की उम्रकैद की सजा को कायम रखा।इसके अलावा अदालत ने पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजा राशि बढ़ाने का आदेश भी दिया है। मृतकों के परिवारों को ₹10 लाख और गंभीर रूप से घायलों को ₹5 लाख की सहायता देने का निर्देश दिया गया है।

अहमदाबाद ब्लास्ट केस केवल एक आतंकी हमले की जांच नहीं, बल्कि भारत की न्याय व्यवस्था, सुरक्षा एजेंसियों की लंबी जांच प्रक्रिया और पीड़ितों को न्याय दिलाने की एक ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई का उदाहरण बन चुका है।

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