दिल्ली-NCR की चमकती ऊंची इमारतों और “स्मार्ट सिटी” के दावों के बीच 9 जुलाई 2026 को सामने आए हादसों ने एक कड़वी सच्चाई दिखा दी। सिर्फ 48 घंटे की बारिश ने नोएडा और गाजियाबाद में ऐसी लापरवाही उजागर कर दी, जहां सड़क पर कुछ कदम चलना भी लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ गया।
नोएडा सेक्टर-58 में 23 वर्षीय इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर आर्यन की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया। भारी जलभराव के बीच वह ऑफिस जा रहे थे। सड़क किनारे नाले को ढकने वाले सीमेंट स्लैब पर चलते समय उनका संपर्क करंट की चपेट में आए बिजली उपकरण से हुआ और वह खुले नाले में गिर गए।
बचाव की कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।वहीं, गाजियाबाद के इंदिरापुरम ज्ञान खंड इलाके में 23 वर्षीय नरेंद्र काछी की मौत ने बिजली व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। बताया गया कि बारिश के पानी में उतरे ही उन्हें करंट लग गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कई मिनट तक लोग चाहकर भी उनकी मदद नहीं कर पाए क्योंकि पानी में बिजली का खतरा बना हुआ था।गाजियाबाद के सर्वोदय नगर में एक तीन साल की बच्ची की जलभराव के दौरान खुले नाले में डूबने से मौत ने सुरक्षा व्यवस्था की खामियों को और उजागर कर दिया।इन घटनाओं को सिर्फ “बारिश से हुई दुर्घटना” कहकर खत्म नहीं किया जा सकता।
मानसून हर साल आता है। सवाल यह है कि हर साल आने वाली बारिश के लिए शहर तैयार क्यों नहीं होते?प्री-मानसून बिजली जांच, नालों की सफाई और खुले मैनहोल बंद करने जैसे काम अक्सर कागजों तक सीमित रह जाते हैं।
जलभराव और खराब बिजली ढांचे का खतरनाक मेल आम सड़कों को जानलेवा बना देता है।सबसे बड़ी समस्या जवाबदेही की है। हादसे के बाद अक्सर विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं—बिजली विभाग जल निकासी को दोष देता है और नगर निकाय बिजली व्यवस्था को।
नोएडा और गाजियाबाद जैसे तेजी से विकसित होते शहरों में नागरिकों को सिर्फ बेहतर सड़कें और ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि सुरक्षित सार्वजनिक स्थानों का अधिकार भी चाहिए।
जब तक लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक “स्मार्ट सिटी” का सपना अधूरी सुरक्षा व्यवस्था के साथ चलता रहेगा।
