‘चिता आंदोलन’ क्या है? विकास परियोजना के खिलाफ आदिवासियों का अनोखा विरोध

मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में चल रहा ‘चिता आंदोलन’ इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। यह आंदोलन किसी वन्यजीव या चीता संरक्षण से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसका नाम अंतिम संस्कार की ‘चिता’ से लिया गया है। केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में आदिवासी महिलाएं और ग्रामीण सांकेतिक चिताओं पर लेटकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।

उनका कहना है कि यदि उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़नी पड़ी, तो यह उनके लिए जीवित रहते हुए मौत के समान होगा।करीब ₹45,000 करोड़ की केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र में दौधन बांध का निर्माण प्रस्तावित है। परियोजना से कई गांव प्रभावित होंगे, जिनमें कुछ पूरी तरह जलमग्न हो जाएंगे जबकि अन्य गांवों के लोगों को पुनर्वास के लिए विस्थापित किया जाएगा। प्रभावित परिवारों का आरोप है कि उन्हें पर्याप्त मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास नहीं दिया जा रहा।

उनकी प्रमुख मांग है कि केवल नकद राशि देने के बजाय ‘ज़मीन के बदले ज़मीन’ उपलब्ध कराई जाए, ताकि उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रह सके।

आंदोलनकारी यह भी आरोप लगा रहे हैं कि ग्राम सभाओं की सहमति पारदर्शी तरीके से नहीं ली गई और प्रशासन ने उनकी आपत्तियों को गंभीरता से नहीं सुना। अप्रैल 2026 में दिल्ली मार्च की कोशिश के बाद आंदोलन ने ‘चिता आंदोलन’ का रूप ले लिया। हाल के दिनों में प्रदर्शन और तेज हुआ है, जबकि प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाने और नए सर्वे का आश्वासन दिया है।

यह आंदोलन केवल एक विकास परियोजना का विरोध नहीं, बल्कि विकास, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को भी सामने लाता है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार और आंदोलनकारी बातचीत के जरिए कोई स्वीकार्य समाधान निकाल पाते हैं या नहीं।

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