22 जुलाई 2026 को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। लाल चौक के पास दिनदहाड़े IRP 3rd Battalion के 35 वर्षीय हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन कुरैशी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमले की जिम्मेदारी The Resistance Front (TRF) ने ली। घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने दक्षिण और मध्य कश्मीर में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाया और एहतियातन 1,200 से अधिक संदिग्धों से पूछताछ की।
बडगाम के लालपोरा गांव के रहने वाले आशिक हुसैन कुरैशी के परिवार के लिए यह दोहरा सदमा है। उनके पिता भी करीब तीन दशक पहले ड्यूटी के दौरान शहीद हुए थे। लगातार दूसरी पीढ़ी के शहीद होने से पूरे इलाके में शोक की लहर है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समेत कई नेताओं और सामाजिक संगठनों ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे कायराना हरकत बताया।इस घटना के बाद राजनीतिक बहस भी तेज हो गई।
सरकार से जुड़े कुछ सुरक्षा विश्लेषकों और नेताओं ने कहा कि दिल्ली में CJP और छात्र आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में CRPF और अन्य केंद्रीय बलों की तैनाती के कारण सुरक्षा संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा। उनका तर्क था कि ऐसे समय में आतंकी संगठन सुरक्षा व्यवस्था में व्यस्तता का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने भी कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर अतिरिक्त दबाव न बढ़ाने की अपील की।
हालांकि विपक्ष और छात्र संगठनों ने इस तर्क का कड़ा विरोध किया। उनका कहना है कि अनंतनाग हमले को छात्र आंदोलन से जोड़ना गलत है और किसी भी सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी संबंधित सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन की होती है। ई लोगों ने सवाल उठाया कि यदि हजारों सुरक्षाकर्मी शांतिपूर्ण प्रदर्शन संभालने में लगाए जा सकते हैं, तो संवेदनशील आतंकी इलाकों की सुरक्षा और मजबूत क्यों नहीं रही।
सोशल मीडिया पर भी लोगों ने संतुलित शासन की मांग करते हुए कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह एक ओर छात्रों को सुरक्षित और निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था दे, तो दूसरी ओर सीमा और आतंक प्रभावित क्षेत्रों में जवानों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे।
