पेपर लीक और छात्र आंदोलन को लेकर संसद का मानसून सत्र 27-28 जुलाई 2026 को बेहद गरमाया रहा। केंद्र सरकार ने लोकसभा में Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026 पेश कर पेपर लीक माफियाओं पर शिकंजा कसने का दावा किया।
प्रस्तावित कानून में दोषियों के लिए 5 से 10 साल तक की सजा, ₹50 लाख तक जुर्माना, संगठित गिरोहों पर ₹10 करोड़ तक का दंड, निजी परीक्षा एजेंसियों पर कड़ी कार्रवाई, दो महीने में जांच और तीन महीने में फास्ट-ट्रैक कोर्ट के जरिए सुनवाई पूरी करने जैसे प्रावधान शामिल हैं।
दूसरी ओर, विपक्ष ने 20 जुलाई के ‘चलो संसद’ छात्र मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार को घेरा। राहुल गांधी ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर स्वतंत्र जांच और जवाबदेही की मांग की, जबकि मणिकम टैगोर समेत कई सांसदों ने स्थगन प्रस्ताव दिया।
हंगामे और नारेबाजी के कारण लोकसभा की कार्यवाही बाधित रही और बिल पर तत्काल चर्चा आगे नहीं बढ़ सकी। बहस के दौरान राहुल गांधी ने कहा कि पेपर लीक अब एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है और केवल सजा बढ़ाने से समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार, निजी एजेंसियों की भूमिका समाप्त करने और अधिक पारदर्शी व्यवस्था की जरूरत है।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का जिक्र करते हुए कहा, “सरकार झुकी और स्वीकार किया”, वहीं प्रियंका गांधी ने छात्रों पर कथित बल प्रयोग और पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों पर सरकार से जवाब मांगा। सरकार की ओर से किरेन रिजिजू ने विपक्ष से सदन चलने देने की अपील की और कहा कि यह कानून छात्रों के भविष्य की सुरक्षा के लिए लाया गया है।
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी भरोसा दिलाया कि नया संशोधन कानून पेपर लीक नेटवर्क के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करेगा। राज्यसभा में भी नीट, छात्र आत्महत्याओं और जंतर-मंतर पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष ने जोरदार विरोध दर्ज कराया।
पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया कि क्या सिर्फ कानून सख्त करने से पेपर लीक रुकेगा या परीक्षा व्यवस्था और एनटीए में व्यापक संस्थागत बदलाव की भी जरूरत है।
