भारत में फूड सेफ्टी और क्वालिटी को लेकर चिंता लगातार बढ़ती जा रही है, खासकर फास्ट फूड और पैकेज्ड फूड सेक्टर में। शहरी जीवनशैली के तेज़ होने के साथ इन उत्पादों पर निर्भरता बढ़ी है, लेकिन इनके इंग्रेडिएंट्स, प्रोसेसिंग और स्टोरेज सिस्टम को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
अगर हम पैकेज्ड फूड की असलियत देखें, तो कई प्रोडक्ट्स में मार्केटिंग और वास्तविक सामग्री के बीच अंतर देखने को मिलता है। उदाहरण के तौर पर, कुछ केचअप ब्रांड्स को “100% टोमेटो” के रूप में प्रचारित किया जाता है, लेकिन असल में इनमें टोमेटो प्यूरी की मात्रा सीमित होती है और बाकी हिस्सों में पानी, शुगर, प्रिज़र्वेटिव्स और थिकनर जैसे तत्व शामिल होते हैं।
इसी तरह पीनेट बटर, इंस्टेंट नूडल्स, सॉस और प्रोसेस्ड स्नैक्स में भी एडिटिव्स और स्टेबलाइज़र का इस्तेमाल सामान्य है, जो प्रोडक्ट की शेल्फ लाइफ बढ़ाते हैं लेकिन पोषण मूल्य पर सवाल खड़े करते हैं।
वहीं दूसरी ओर, फास्ट फूड चेन जैसे KFC, Domino’s और अन्य आउटलेट्स में सबसे बड़ी चिंता कुकिंग ऑयल के बार-बार उपयोग (reused oil) और हाई-टेम्परेचर फ्राइंग प्रोसेस को लेकर रहती है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है।
FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) के अनुसार, हर साल हजारों सैंपल टेस्ट किए जाते हैं और लगभग 3%–5% सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरते। हाल के वर्षों में कई बड़े ब्रांड्स को लेबलिंग और हाइजीन से जुड़ी समस्याओं पर नोटिस भी जारी किए गए हैं।इसके साथ ही शहरी भारत में फास्ट फूड की खपत पिछले कुछ वर्षों में लगभग 20%–25% तक बढ़ी है, जिससे सप्लाई चेन, फ्रैंचाइज़ सिस्टम और क्वालिटी कंट्रोल पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।
भारत में पहले भी Maggi केस (2015) और Nestlé India जांच जैसे बड़े उदाहरण सामने आ चुके हैं, जिन्होंने पूरे फूड इंडस्ट्री को सतर्क कर दिया था। इसके बाद से रेगुलेटरी निगरानी और अधिक सख्त हुई है।
भारत का फूड सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन साथ ही पारदर्शिता, सही इंग्रेडिएंट जानकारी और हाइजीन स्टैंडर्ड्स को लेकर जागरूकता बेहद जरूरी है। उपभोक्ताओं को लेबल पढ़ने की आदत विकसित करनी होगी और रेगुलेटरी सिस्टम को लगातार मजबूत बनाना होगा ताकि सुरक्षित भोजन सुनिश्चित किया जा सके।
