पंजाब में खेलों को गांव-गांव तक पहुंचाने और युवाओं को नशे से दूर रखने के उद्देश्य से ‘खेड़ां वतन पंजाब दियां’ जैसे ग्रामीण खेल आयोजनों को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका मकसद सिर्फ प्रतियोगिताएं कराना नहीं, बल्कि गांव के मैदानों से प्रतिभाओं को तलाशकर उन्हें जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए एक मजबूत खेल व्यवस्था तैयार करना है। कबड्डी, कुश्ती और एथलेटिक्स जैसे पारंपरिक खेलों के साथ युवाओं को अलग-अलग खेलों में आगे बढ़ने का अवसर देने पर जोर है।
इस मॉडल में प्रतियोगिताओं को गांव, ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर तक ले जाने की व्यवस्था की गई है। जीतने वाले खिलाड़ियों को पुरस्कार, प्रशिक्षण और आगे की प्रतियोगिताओं में पहुंचने के अवसर दिए जाते हैं। सरकार की खेल नीति में खिलाड़ियों के लिए खेल कोटे के तहत सरकारी नौकरियों का रास्ता भी रखा गया है। राज्य की नीतियों में 3% खेल कोटे और खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देने वाली विभिन्न योजनाओं का प्रावधान है। इससे खेल को सिर्फ शौक नहीं बल्कि करियर के विकल्प के रूप में देखने का संदेश दिया जा रहा है।
ग्रामीण खेलों की सबसे बड़ी जरूरत मैदान और सुविधाओं की है। इसी दिशा में पंजाब में हजारों ग्रामीण खेल मैदानों को विकसित या अपग्रेड करने की योजनाएं सामने आई हैं। कई जगह पंचायतों और मनरेगा जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से मैदानों को बेहतर बनाने, चारदीवारी, ट्रैक और दूसरी मूलभूत सुविधाएं तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। लक्ष्य यह है कि युवाओं को खेलने के लिए गांव से बाहर जाने की जरूरत कम पड़े।
हालांकि, इस पूरी व्यवस्था के सामने कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं। आलोचकों का कहना है कि प्रतियोगिताओं का उत्साह कई बार कुछ महीनों तक ही सीमित रह जाता है और बाद में मैदानों के रखरखाव तथा नियमित प्रशिक्षण की समस्या सामने आती है। बड़ी संख्या में प्रतिभाओं की पहचान होने के बावजूद गांव के स्तर पर प्रशिक्षित और अनुभवी कोचों की उपलब्धता अभी भी एक चुनौती है। स्कूलों और कॉलेजों के शैक्षणिक कार्यक्रमों के साथ प्रतियोगिताओं की तारीखों का टकराव भी छात्र खिलाड़ियों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है।
ग्रामीण खेलों के बीच डोपिंग और प्रतिबंधित पदार्थों के इस्तेमाल का मुद्दा भी चिंता का विषय है। खासकर ताकत और प्रदर्शन आधारित खेलों में युवा खिलाड़ियों पर जल्दी सफलता हासिल करने का दबाव उन्हें असुरक्षित सप्लीमेंट या प्रतिबंधित पदार्थों की ओर धकेल सकता है। इसलिए खेलों के विस्तार के साथ-साथ नियमित जागरूकता, मेडिकल निगरानी और डोपिंग नियंत्रण को भी जमीनी स्तर तक मजबूत करना जरूरी है।
पंजाब में सर्कल कबड्डी की अपनी अलग सामाजिक और आर्थिक पहचान है। प्रवासी पंजाबी समुदाय लंबे समय से गांवों और कबड्डी क्लबों को आर्थिक सहयोग देता रहा है। सरकारी खेल आयोजनों में इस खेल को शामिल करने से इसे अधिक संस्थागत मंच देने और स्थानीय स्तर पर इसकी गतिविधियों को व्यवस्थित करने की कोशिश भी दिखाई देती है।
‘खेड़ां वतन पंजाब दियां’ की असली सफलता केवल कितने खिलाड़ियों ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, इससे तय नहीं होगी। सवाल यह है कि प्रतियोगिता खत्म होने के बाद कितने खिलाड़ियों को लगातार कोचिंग, मैदान, उपकरण, आर्थिक मदद और प्रतियोगिताओं के अवसर मिलते हैं। अगर गांव का मैदान पूरे साल आबाद रहता है और वहां से निकलने वाली प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का रास्ता मिलता है, तभी पंजाब का यह ग्रामीण खेल मॉडल अपने बड़े उद्देश्य को हासिल कर पाएगा।
