ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने अपना अभियान शानदार अंदाज़ में समाप्त किया। भारतीय दल ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया।
भारत ने मेजबान स्कॉटलैंड को अधिक रजत पदकों के आधार पर पीछे छोड़ा। इस बार शूटिंग, कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस और हॉकी जैसे भारत के पारंपरिक मजबूत खेल कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थे, फिर भी भारतीय खिलाड़ियों ने बॉक्सिंग, जूडो, पैरा-एथलेटिक्स और एथलेटिक्स में ऐतिहासिक प्रदर्शन कर नया अध्याय लिखा।
सबसे बड़ी सफलता बॉक्सिंग में मिली, जहाँ भारत ने 10 पदक (7 स्वर्ण, 3 रजत) जीतकर किसी एक देश का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दर्ज किया। साक्षी चौधरी, प्रीति पवार, जैसमीन लम्बोरिया, प्रिया घंघास, अरुंधति चौधरी, सचिन सिवाच और अंकुश पंघाल ने स्वर्ण पदक जीते, जबकि लवलीना बोरगोहेन, जादुमणि सिंह और नरेंद्र बरवाल रजत पदक विजेता रहे।
वेटलिफ्टिंग और पैरा पावरलिफ्टिंग में भारत ने 9 पदक जीते। मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स स्वर्ण पदक अपने नाम किया। वहीं झंडू कुमार ने पैरा पावरलिफ्टिंग में कांस्य जीतकर भारत का पहला पदक दिलाया।पैरा-एथलेटिक्स भारत के लिए सबसे प्रेरणादायक खेलों में रहा।
शर्मिला धनकर, सोमन राणा और दिलीप महादू गावित ने स्वर्ण पदक जीते। दिलीप गावित ने पुरुष 100 मीटर T47 में 10.71 सेकंड का नया कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण जीता, जबकि मोहम्मद बासिल ने रजत पदक जीतकर भारत को ऐतिहासिक 1-2 फिनिश दिलाई।
यह कॉमनवेल्थ गेम्स में पुरुष पैरा-एथलेटिक्स में भारत की पहली गोल्ड-सिल्वर उपलब्धि रही।जूडो में भी भारत ने इतिहास रचा। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने भारत को पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो का स्वर्ण पदक दिलाया। यामिनी मौर्य ने रजत और उन्नति शर्मा ने कांस्य जीतकर भारत का सर्वश्रेष्ठ जूडो अभियान पूरा किया।
एथलेटिक्स में भारत ने 10 पदक जीते। नीरज चोपड़ा ने पुरुष भाला फेंक में रजत और यशवीर सिंह ने कांस्य जीतकर डबल पोडियम दिलाया। गुलवीर सिंह एक ही कॉमनवेल्थ गेम्स में दो व्यक्तिगत पदक जीतने वाले पहले भारतीय धावक बने। मुरली श्रीशंकर, प्रवीण चित्रावेल, सेल्वा प्रभु, तेजस्विन शंकर, सर्वेश कुशारे और सीमा कालीरामना ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत की झोली में पदक डाले।
इन खेलों की सबसे प्रेरणादायक कहानियाँ खिलाड़ियों के संघर्ष से जुड़ी रहीं। शर्मिला धनकर, जिन्होंने पोलियो, घरेलू हिंसा और आर्थिक कठिनाइयों से लड़कर 40 वर्ष की उम्र में स्वर्ण पदक जीता, करोड़ों लोगों के लिए मिसाल बनीं।
अस्मिता डे ने पिता के निधन के सात महीने बाद भारत को पहला जूडो स्वर्ण दिलाकर उनका सपना पूरा किया। वहीं बिहार के सब्जी विक्रेता के बेटे झंडू कुमार, जो कभी ई-रिक्शा चलाकर परिवार चलाते थे, आज भारत के लिए कॉमनवेल्थ पदक जीत चुके हैं।
ग्लासगो 2026 ने साबित कर दिया कि सीमित खेलों के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों का हौसला और प्रदर्शन किसी से कम नहीं है। यह अभियान केवल पदकों की सफलता नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और नए भारत की खेल शक्ति का प्रतीक बनकर इतिहास में दर्ज हो गया।
