‘बिहार के मशरूम मैन’ संजीव कुमार की प्रेरक कहानी: इंजीनियरिंग छोड़ खेती चुनी, 50 हजार से अधिक लोगों को बनाया आत्मनिर्भर

पटना: बिहार के नालंदा जिले के एक छोटे से गांव से निकली एक सोच ने आज हजारों ग्रामीण परिवारों की जिंदगी बदल दी है। ‘बिहार के मशरूम मैन’ के नाम से पहचान बना चुके संजीव कुमार ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कॉरपोरेट नौकरी का रास्ता छोड़ खेती को अपना मिशन बनाया। आज उनके प्रयासों से 50 हजार से अधिक ग्रामीण, खासकर महिलाएं, मशरूम की खेती के जरिए आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।

नालंदा जिले के मोहद्दीपुर गांव के रहने वाले संजीव कुमार ने BIT सिंदरी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी होने के बाद जहां अधिकांश युवा बड़े शहरों में नौकरी की तलाश करते हैं, वहीं संजीव ने गांव लौटकर खेती में नई तकनीक के साथ कुछ अलग करने का फैसला किया। वर्ष 2002 में उन्होंने हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित डायरेक्टरेट ऑफ मशरूम रिसर्च से मशरूम उत्पादन का विशेष प्रशिक्षण लिया और फिर बिहार में इसकी शुरुआत की।

शुरुआती दौर आसान नहीं था। उस समय बिहार के ग्रामीण इलाकों में मशरूम की खेती लगभग अंजान थी। लोगों को इस खेती पर भरोसा नहीं था, अच्छी गुणवत्ता वाले मशरूम बीज (स्पॉन) उपलब्ध नहीं थे और आर्थिक चुनौतियां भी सामने थीं। लेकिन संजीव कुमार ने हार नहीं मानी। लगातार प्रयोग, मेहनत और धैर्य के दम पर उन्होंने मशरूम उत्पादन का ऐसा मॉडल विकसित किया, जिसने धीरे-धीरे पूरे राज्य में नई पहचान बना ली।

व्यक्तिगत व्यवसाय बढ़ाने के बजाय संजीव कुमार ने अपना ध्यान ग्रामीणों को प्रशिक्षित करने पर केंद्रित किया। उन्होंने विभिन्न संस्थानों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से 50 हजार से अधिक किसानों और ग्रामीणों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दिया। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की रही, जिन्होंने घर बैठे कम लागत में मशरूम उगाकर अपनी आय बढ़ाई। संजीव का मॉडल इस विचार पर आधारित है कि खेती के लिए बड़ी जमीन जरूरी नहीं है। धान के पुआल जैसे कृषि अवशेषों का उपयोग कर छोटे कमरों में भी मशरूम की सफल खेती की जा सकती है।

मशरूम के गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी को दूर करने के लिए संजीव कुमार ने अपने गांव में SABRI (Systemic Agro Based Research Institute) Spawn Lab की स्थापना की। आज यह बिहार की सबसे बड़ी निजी मशरूम स्पॉन उत्पादन इकाइयों में से एक मानी जाती है। यहां प्रतिदिन लगभग 600 किलोग्राम स्पॉन तैयार किया जाता है, जिसे जल्द बढ़ाकर 1,000 किलोग्राम प्रतिदिन करने की योजना है। यह लैब केवल बिहार ही नहीं, बल्कि झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और हरियाणा के किसानों को भी ऑयस्टर, बटन और मिल्की मशरूम के बीज उपलब्ध करा रही है।

इस लैब ने स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा किया है। यहां गांव के कई युवक-युवतियां आधुनिक और ऊर्जा-कुशल मशीनों के साथ काम कर रहे हैं। भविष्य में इस इकाई में AI आधारित तापमान और आर्द्रता नियंत्रण प्रणाली भी लागू करने की तैयारी है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा।

संजीव कुमार अब मशरूम उत्पादन को केवल खेती तक सीमित नहीं रखना चाहते। वे 200 टन वार्षिक क्षमता वाले आधुनिक बटन मशरूम उत्पादन केंद्र की स्थापना कर रहे हैं। इसके साथ ही मशरूम पाउडर, अचार, हेल्थ सप्लीमेंट जैसे वैल्यू-एडेड उत्पादों के निर्माण पर भी काम चल रहा है। वहीं, मशरूम उत्पादन के बाद बचने वाले अवशेषों को जैविक खाद में बदलकर किसानों को रासायनिक उर्वरकों का बेहतर विकल्प भी उपलब्ध कराया जा रहा है।

संजीव कुमार की इस पहल का असर पूरे बिहार में देखने को मिला है। राज्य में मशरूम उत्पादन 2016 के 1.29 लाख टन से बढ़कर 2024 में 3.99 लाख टन तक पहुंच गया। ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने वाले उनके मॉडल को कई सरकारी अधिकारियों और कृषि विशेषज्ञों ने सराहा है तथा इसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के ग्रामीण विकास मॉडल के अनुरूप भी माना गया है।

संजीव कुमार का मानना है कि “Mass Production नहीं, बल्कि Production by Masses” ही ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बना सकता है। उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि सही सोच, तकनीक और समाज के प्रति समर्पण के साथ एक व्यक्ति न केवल अपनी जिंदगी बदल सकता है, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य को भी नई दिशा दे सकता है।

Author

कर्नाटक में भर्ती परीक्षाओं पर बवाल: पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्रों का प्रदर्शन तेज, NTA में सुधार और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की मांग

पेरू विमान हादसा: नाज़्का लाइंस की सैर पर निकला टूरिस्ट विमान रेगिस्तान में हुआ क्रैश, 13 लोगों की मौत

Leave a Reply